MANAGEMENT OF HYPERTENSION

MANAGEMENT OF HYPERTENSION

लगभग 25 वर्ष पूर्व हम Hypertension की प्रभावशाली चिकित्सा खोज निकालने का प्रयास कर रहे थे ।
इसके लिए निम्न अवधारणा (hypothesis) के आधार पर आगे बढ़ने का निर्णय किया गया –

1. प्रधान-दोष निर्णय:

सबसे पहले इस निर्णय पर पहुँचना आवश्यक था कि इस रोग (रोग-समूह) में मौलिक दुष्टि किस दोष की रहती है?


क्योंकि यह विषय (matter) रक्त-संवहन से जुड़ा है, अतः मान लिया गया कि प्रधान दोष है – व्यान-वायु;

2. अब, प्रश्न था कि – व्यान-वायु की दुष्टि किस प्रकार से होती है?

इसके लिए वात-दुष्टि के सामान्य सिद्धांत को माना गया कि, (व्यान)वायु दुष्टि दो प्रकार से सम्भव है:

  • धातु-क्षय
  • मार्ग-आवरण


3. धातु-क्षय किस प्रकार से व कहाँ होता है?

वय बढ़ने के साथ-साथ धमनियों की मृदुता (elasticity) में कमी व जाड्यता (hardness) में वृद्धि होती है; जो धमनीगत धातु-क्षय का परिचायक है।

4. व्यान-वायु का मार्ग-आवरण कौन व कहाँ करता है?

उपलब्ध ज्ञान व अनुभव के आधार पर निश्चित किया गया कि व्यान-वायु का मार्ग-आवरण मुख्य रूप से वायु के अन्य 4 भेद ही करते हैं –

  • व्यक्ति यदि चिरकाल तक अत्यधिक चिंता-भय-क्रोध-ईर्ष्या-द्वेष-लोभ-मोह-अहंकार करता है तो उसका प्राण-वायु (higher centers in the brain related with cognition, thinking, & emotions) प्रकुपित हो कर व्यान-वायु (neuro-endocrine system that regulates heart and blood circulation) के प्राकृत रक्त-संवहन (normal blood circulation) के कार्य में व्यवधान उत्पन्न करके धमनियों के दाब को बढ़ा सकता है;
  •  व्यक्ति के मूत्रवहस्रोतस् (urinary system) में यदि चिरकाल तक अत्यधिक रौक्ष्य-शोथ-क्षय-अवरोध इत्यादि रहते हैं, तो उसका अपान-वायु (neuro-endocrine system related with excretory functions) प्रकुपित हो कर व्यान-वायु के प्राकृत रक्त-संवहन के कार्य में व्यवधान उत्पन्न करके धमनियों के दाब को बढ़ा सकता है;
  • व्यक्ति की धात्वाग्नि-क्रिया (metabolism) में यदि चिरकाल तक अत्यधिक विकृति रहती है, तो उसका समान-वायु (neuro-endocrine system related with metabolism) प्रकुपित हो कर व्यान-वायु के प्राकृत रक्त-संवहन के कार्य में व्यवधान उत्पन्न करके धमनियों के दाब को बढ़ा सकता है;
  • व्यक्ति के उदान-वायु (hypothalamic-pituitary system) में यदि चिरकाल तक विकृति रहती है तो वह व्यान-वायु के प्राकृत रक्त-संवहन के कार्य में व्यवधान उत्पन्न करके धमनियों के दाब को बढ़ा सकता है।


5. दोष शमन कैसे हो?

फिर दोष-दुष्टि को दूर करने का प्रयास निम्न रीति से किया गया –

I. दुष्ट व्यान-वायु के शमन के लिए:

  • सर्पगन्धा (व्याधि-प्रत्यनीक)
  • रसायन (अश्वगंधा, आमलकी, हरीतकी)


II. दुष्ट प्राण-वायु के शमन के लिए:

  • मेध्य-रसायन (शंखपुष्पी, ब्राह्मी)
  • तगर


III. दुष्ट अपान-वायु के शमन के लिए:

  • पुनर्नवा
  • गोक्षुर


IV. दुष्ट समान-वायु का शमन के लिए:

  • भूम्यामलकी


V. दुष्ट उदान-वायु का शमन के लिए:

  • जटामाँसी।


परिणाम:

दोष-प्रत्यनीक चिकित्सा व व्याधि-प्रत्यनीक चिकित्सा के समन्वय के आधार पर विकसित इस उपचार का MANAGEMENT OF HYPERTENSION में अति-सन्तोषजनक प्रभाव मिलता है।


रोगी का बढ़ा हुआ रक्त-दाब धीरे-धीरे कम होता है व प्रभाव दीर्घकालिक होता है।
इसी अवधारण के आधार पर हमने निम्न औषधियों के Whole extracts को मिलाया:

  • भूम्यामलकी 250 mg
  • पुनर्नवा 200 mg
  • शंखपुष्पी 150 mg
  • जटाधारी 100 mg
  • सर्पगन्धा 100 mg


यही योग SAMVYAN Tablet के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।
मात्रा: 1-2 टैब्लेट्स दिन में तीन बार से आरम्भ करें । परिणाम आने पर धीरे-धीरे मात्रा कम करके न्यूनतम स्तर तक लाने का प्रयास करें।

डाॅ.वसिष्ठ
Dr. Sunil Vasishth
M. + 91-9419205439
Email : drvasishthsunil@gmail.com
Website : www.drvasishths.com

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