हृद्-धमनी रोग चिकित्सा

Management of Ischemic Heart Disease




     वर्ष 1966 में बी.एॅच.यू. के कायचिकित्सा विभाग के प्राचार्य डाॅ. एॅस. एॅन. त्रिपाठी जी ने अपने पी.एॅच.डी. के शोध-प्रबन्ध में बताया कि गुग्गुलु में शोथहर (Anti-inflammatory) होने के साथ-साथ रक्तगत बढ़ी हुई वसा (Cholesterol and triglycerides) को कम करने (Hypo-cholesterolemic and hypo-triglyceridemic) की क्षमता है।  साथ ही, यह धमनीप्रतिचय का भी प्रतिकार (Anti-atherosclerotic) करता है।

   इस शोध में भारत व कई अन्य देशों के वैज्ञानिकों व चिकित्सकों ने रुचि दिखाते हुए इस दिशा में अपने-अपने ढंग से अनुसंधान करना आरम्भ कर दिया। इन्हीं केन्द्रों में से एक केन्द्र लखनऊ स्थित सैंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीटयूट (CDRI) भी था जहाँ गुग्गुलु पर डाॅ. एॅस. सी. मल्होत्रा के दिशा निर्देश में काफी महत्वपूर्ण कार्य हुआ व गुग्गलु से जुड़े कई तथ्य विश्व के समक्ष प्रकाशित हुए।

इसके साथ-साथ बी.एॅच.यू. के कायचिकित्सा विभाग में डाॅ. एॅस. एॅन. त्रिपाठी जी के दिशा निर्देश में गुग्गलु पर शोधकार्य जारी रहा, जिनमें से दो मुख्य शोधकर्ता थे – डाॅ. बी. एॅन. उपाध्याय जी व डाॅ. ओ. पी. गुप्ता जी ।

बाद में इस शोधकार्य को आगे बढ़ाने का उत्तरदायित्व आया एॅम.डी. आयुर्वेद के एक छात्र डाॅ. विजय गुप्ता जी पर।
अब तक डाॅ. त्रिपाठी जी की रुचि आयुर्वेद में विशिष्ट स्थान प्राप्त करने वाली एक अन्य औषधी – _पुष्करमूल_ – पर भी आ गई थी।

इसका कारण था पुष्करमूल का हृच्छूलहर कर्म (Anti-anginal action) जो अन्य किसी भी आयुर्वैदिक वानस्पतिक औषधी (Medicinal herb) से कहीं अधिक था।

ऐसा नहीं कि आयुर्वेद के मनीषियों ने पुष्करमूल में विद्यमान अन्य गुण-कर्मों का वर्णन नहीं किया था । किया था, और कई सारे अन्य गुण-कर्म बताए भी थे, जैसे कि श्वासहर (Anti-asthmatic), कासहर (Anti-tussive), हिक्काहर (Anti-hiccup), पार्श्वशूलहर (Anti-pleurodynic) इत्यादि ।

किंतु, इस सब के बावजूद पुष्करमूल को हृच्छूलहर के रूप में जो ख्याति मिली थी, वह बेजोड़ थी।

इसी ख्याति को दृष्टिगत रखते हुए डाॅ. त्रिपाठी जी ने पुष्करमूल के हृदय पर होने वाले कर्मों के वैज्ञानिक अनुसंधान का मन बनाया।
उन्होंने अपने एॅम.डी. आयुर्वेद के एक छात्र डाॅ. विजय गुप्ता जी के शोध-प्रबन्ध (Thesis) के लिए पुष्करमूल का हृच्छूलहर (Anti-anginal) प्रभाव देखने के लिए विषय चुना।

डाॅ. विजय गुप्ता जी ने हृच्छूल (Angina) के रोगियों पर तात्कालिक कर्म (Short term action) व दीर्घकालिक कर्म (Long term action) देखना शुरु किया।
इस अध्ययन में डाॅ. गुप्ता जी ने पाया कि पुष्करमूल में तत्काल व दीर्घकाल में हृच्छूल कम करने का कर्म है।

वह रोगी की आराम कराने के बाद ई.सी.जी. कराते। फिर रोगी को कुछ श्रम (Exercise) कराया जाता व उससे होने वाले हृच्छूल (Angina) तथा ई.सी.जी. में अल्परक्तता (Ischemia) देखने का प्रयास करते। 

तदुपरांत, रोगी को 2 ग्राम पुष्करमूल का चूर्ण सेवन कराया जाता व फिर आधे, एक, डेढ़, व दो घण्टों के बाद रोगी को श्रम कराकर होने वाले हृच्छूल  व ई.सी.जी. में अल्परक्तता को देखते।

इस सारी प्रक्रिया से यह देखा गया कि  पुष्करमूल चूर्ण सेवन करने के 1-2 घण्टे के बाद श्रम कराने से न केवल हृच्छूल कम अथवा नहीं होती है, अपितु श्रम से होने वाली अल्परक्तता-जन्य परिवर्तन (Ischemic changes) भी कम या नहीं होती हैं।

दूसरी ओर, यह भी देखा गया कि लम्बे समय (2-3 माह) तक पुष्करमूल के सेवन से धीरे-धीरे रोगी को होने वाले हृच्छूल में भी कमी आती थी।

इसके बाद सितम्बर 1982 से मैंने प्रो. त्रिपाठी जी के दिशा निर्देश में पहले  एॅम.डी. (आयुर्वेद) व 1984 से पी.एॅच.डी. का अध्ययन आरम्भ किया।

मेरी परम इच्छा को स्वीकारते हुए श्रद्धेय गुरुजी ने विभाग में हृद्रोग पर चलते हुए अनुसंधान को आगे बढ़ाने का निश्चय किया व मेरे शोध-प्रबन्ध (Thesis) के लिए पुष्करमूल-ब्राह्मी-गुग्गुलु का हृद्-धमनी रोग (Ischemic heart disease) की चिकित्सा में प्रभाव देखना निश्चित किया।

मेरे एॅम. डी. आयुर्वेद के शोधकार्य को दो भागों में बांटा गया –

(i) मेंढक के हृदय पर पुष्करमूल की इक्स्पैरिमॅन्टल स्टडी (Experimental study of Pushkarmula on frog heart); व 

(ii) हृद्य-धमनी रोग (Ischemic heart disease) पर पुष्करमूल + ब्राह्मी + गुग्गुलु की क्लीनिकल स्टडी (Clinical study of Pushkarmula+Brahmi+Guggulu on the patients of IHD) ।

मेंढक के हृदय पर पुष्करमूल की इक्स्पैरिमॅन्टल स्टडी (Experimental study of Pushkarmula on frog heart) के लिए मुझे इन्स्टिट्यूट अॅव मैडीकल साईंसिज (IMS), बी.एॅच.यू . (BHU) के फार्मैकाॅलॅजी विभाग में प्रो. एॅस. एॅस. गम्भीर जी के साथ कार्य करने का सुअवसर मिला।

प्रो. गम्भीर जी ने मुझे कहा कि पुष्करमूल का हृदय की क्रिया पर क्या प्रभाव पड़ता है, यह देखने के लिए हमें इसके विभिन्न इक्स्ट्रैक्ट्स (Extracts) को मेंढक के पृथक्कृत हृदय (Isolated frog heart) में डाल कर देखना होगा।

इसके लिए मेंढक के हृदय को उसकी देह से अलग करके फिर उसकी हृद्-धमनियों (Coronary arteries) में पुष्करमूल के विभिन्न इक्स्ट्रैक्ट्स का घोल (Solution) सिरिंज के माध्यम से डाला जाता व उससे होने वाले प्रभाव को एक ड्रम पर लगे स्मोक्ड पेपर (धुएँ की कालिख वाले काग़ज़) पर ग्राफ़ के रूप में रिकाॅर्ड किया जाता।

सब कुछ अत्यन्त रोमाञ्चक था।

मुझे पुष्करमूल के चार इक्स्ट्रैक्ट्स की परीक्षा करनी थी – 

(i) जल में बना इक्स्ट्रैक्ट (Aqueous extract);
(ii) एल्कोहल में बना इक्स्ट्रैक्ट (Alcoholic extract);
(iii) पिट्रौलियम ईथर में बना इक्स्ट्रैक्ट (Petroleum extract); व
(iv) क्लोरोफाॅर्म में बना इक्स्ट्रैक्ट (Choloroform extract)।

इस स्टडी में मैंने पाया कि पुष्करमूल के लगभग सभी इक्स्ट्रैक्ट्स कमोबेश मेंढक के हृदय पर निम्न दो कर्म कर रहे थे –

(i) हृदय की आकुञ्चन शक्ति (Force of contraction) कम हो रही थी (Negative inotropic effect); व
(ii) हृदय की गति (Heart rate) कम हो रही थी (Negative chronotropic effect)।

मेंढक के हृदय पर पुष्करमूल के ये दोनों कर्म बीटा-ब्लाॅकर्ज़ (Betablockers) के समान ही माना जा रहा था।
फिर कुछ ऐसे प्रमाण भी सामने आए जो यह संकेत कर रहे थे कि पुष्करमूल हृद्धमनियों (Coronary arteries) को विस्फारित करने का काम भी करता है।

इस कार्य को सिद्ध करने के लिए कुत्ते के हृदय पर आधारित लैजन्डाॅर्फ्स इक्स्पैरिमॅन्ट (Langendorf’s experiment) करने का निश्चय किया गया।
दुर्भाग्यवश किन्हीं अपरिहार्य कारणों से इसे बीच में ही छोड़ना पड़ा।
इससे मुझे गहरा खेद हुआ ।

फिर भी मुझे इस बात का सन्तोष था कि मैं मेंढक के हृदय पर होने वाले पुष्करमूल के उन प्रभावों को उजागर करने में तो सफल हो ही गया था जो बताते थे कि इस औषधी का हृच्छूलहर कर्म (Antianginal action) था।

इसके साथ-साथ अल्परक्तता-जन्य हृदयरोग (Ischemic heart disease) से पीड़ित 44 रोगियों पर पुष्करमूल+ब्राह्मी+गुग्गुलु की मेरी क्लीनिकल स्टडी जारी थी व इसके अति-उत्साहवर्धक परिणाम मिल रहे थे।

इस योग की क्रिया-विधि (Mode of action) निम्न रूप से समझा जा रहा था – 

● पुष्करमूल बीटा-ब्लाॅकर्ज़ (Betablockers) के समान हृदय की आकुञ्चन शक्ति व गति कम करता है, तथा नाइट्रेट्स के समान हृद्धमनियों का विस्फारण (Coronary vasodilation) करता है। 

● गुग्गुलु रक्तगत बहुमेदस (Raised blood cholesterol and triglycerides) को कम करता है; थायरायड को उत्तेजित करता है, व धमनीप्रतिचय (Atherosclerosis) का निराकरण करता है।

● ब्राह्मी मानसिक तनाव को कम करती है।

1984 में मैंने अपनी पी.एॅच.डी. में भी अल्परक्तता-जन्य हृदयरोग (Ischemic heart disease) पर पुष्करमूल+ब्राह्मी+गुग्गुलु की अपनी रिसर्च को जारी रखा व 150 रोगियों पर इस योग का प्रभाव देखा जो अति-उत्साहवर्धक था।

बरसों बाद

नब्बे के दशक के आरम्भिक वर्षों में मैंने हृदयरोग पर अपने अनुसंधान को आगे बढ़ाने का निश्चय किया। अब मेरी पत्नी डाॅ. बृजबाला जी भी मेरे साथ कार्य कर रही थीं।

हम कई प्रकार के अनुभवों से गुज़रे व अन्य में हमने दो योग बनाने का निर्णय लिया –

CORFLOZ Tablet

इसमें हमने पुष्करमूल +ब्राह्मी + अर्जुन डाले । हमने इसे निम्न कार्यविधि के लिए तैयार किया –

  • Coronary vasodilator
  • Negative inotropic
  • Negative chronotropic
  • Protects coronary endothelium from damage
  • Negative chronotropic
  • Lowers raised blood cholesterol
  • Improves myocardial dysfunction
  • Stimulates hypoactive thyroid
  • Improves microcirculation

THYRIN Tablet

इसमें हमने गुग्गुलु + ब्राह्मी + रक्त-मरिच + गण्डीर + पिप्पली डाले । हमने इसे निम्न कार्यविधि के लिए तैयार किया – 

  • Lowers raised blood cholesterol
  • Anti-atherosclerotic
  • Stimulates hypoactive thyroid
  • Improves microcirculation
  • Anticoagulant


अल्परक्तता-जन्य हृद्रोग (IHD) के रोगियों को हमने इन रोगों को निम्न रूप से प्रयोग करना आरम्भ किया –
R/

CORFLOZ Tablet 
2 tabs, thrice a day

THYRIN Tablet
1 tab, thrice a day

परिणाम अति-उत्साहवर्धक रहते हैं।

2013 में RGGPG Govt. Ayurvedic College, Paprola (HP) में CORFLOZ Tablet पर डाॅ. योगेन्द्र शर्मा जी दिशा निर्देश में डाॅ. अमन सोंखला ने भी एॅम.डी. आयुर्वेद के लिए शोध-प्रबन्ध लिखा गया व इसे हृच्छूल (Angina) व हृद्धमनी रोग (IHD) में प्रभावशाली पाया।
डाॅ.वसिष्ठ
Dr. Sunil Vasishth
M. + 91-9419205439
Email : drvasishthsunil@gmail.com

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