आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग -42

हार्ट फेलियर (Heart failure) – 4

प्रिय चिकित्सक श्री,

आगामी तीन किश्तें हार्ट फेलियर के हेतुओं व संक्षिप्त सम्प्राप्ति पर हैं।  इन्हें पढ़ते-पढ़ते विषय कदाचित् आपको नीरस लगने लगेगा। परंतु, हार्ट फेलियर के समुचित ज्ञान के लिए इन्हें लिखना अनिवार्य था, इसलिए लिखा है।

मुझे इस बात का पूरा एहसास है कि प्रस्तुत विषय एकदम तकनीकी होने से समझने में किञ्चित् कठिन व नीरस हो गया है।

हो सकता है, पढ़ते-पढ़ते आप थक जाएँ व इसे बीच में ही छोड़ने की इच्छा करे। किंतु आप ऐसा न करें। क्योंकि हार्ट फेलियर (हृद्दौर्बल्य) एक अति महत्वपूर्ण रोग है तथा सम्यक् चिकित्सा के लिए इसे सूक्ष्मता से समझना अत्यावश्यक है।

आप इस विषय को टुकड़ों में ही सही पर पढ़ते जाएँ व बार-बार पढ़ें व अमूल्य ज्ञान को आत्मसात करने का प्रयास करें।

यदि आप ऐसा करते हैं, तो मेरा दृढ़ विश्वास है कि अन्त में आप इस दुरूह विषय को बहुत अच्छे से जान व समझ पाएँगे व इसका लाभ अपने रोगियों को दे पाएँगे ।

धन्यवाद!


अगले कई दिनों तक मैं हृद्दौर्बल्य (Heart failure) की बारीकियों को समझने में लगा रहा। 

वाॅर्ड व ओ.पी.डी. से जो समय बचता, उसे मैं हृद्दौर्बल्य (Heart failure) को पढ़ने, समझने, चर्चा करने, व उस पर मन्थन करने में खर्च करता।

हृद्दौर्बल्य (Heart failure) को भली-भाँति समझने के लिए मुझे मैडीसिन, पैथाॅलॅजी, व फार्मैकाॅलॅजी के साथ-साथ एक बार पुनः प्रो. गायटन जी की _टैक्स्ट बुक अॅव मैडीकल फ़िज़िऑलॅजी_ की शरण लेनी पड़ी।

एक बात तो तय थी। हृद्दौर्बल्य (Heart failure) का विषय जितना जटिल था, समझ में आने के बाद उतना ही आनन्ददायक भी था।

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  • परम रसायन (Antioxidant)
  • शक्तिवर्धक (Tonic)
  • जरानाशक (Antiaging)


ज्यों-ज्यों मैं विषय की गहराई में उतरता गया, त्यों-त्यों मुझे इससे मिलने वाले आनंद की अनुभूति भी बढ़ती चली गई।

हार्ट फेलियर की आधारभूत विकृतियाँ:

अभी तक यह तथ्य स्पष्ट हो चला था कि हृद्दौर्बल्य (Heart failure) मुख्य रूप से दो प्रकार की आधारभूत प्रक्रियाओं (Underlying mechanisms) से हो सकता था – 

  1. हृदय में मौजूद मांस-धातु (हृद्-मांस-धातु – Myocardium) में किसी भी प्रकार का दौर्बल्य (Weakness) आ जाने से; अथवा
  2. हृदय पर किसी भी प्रकार का दबाव (Load) बढ़ने से।

गहराई से पढ़ने व विचार करने पर यह बात भी सामने आई कि उपरोक्त दोनों प्रकार की प्रक्रियाओं के लिए अनेकों हृद्गत (Cardiac) व हृदयेतर ( Extra-cardiac) विकृतियाँ (Abnormalities) उत्तरदायी थीं, यथा – 

  • हृद्-मांस-धातु (Myocardium) की आकुञ्चन-क्षमता (Contractility) में कमी;
  • हृदय से बाहर जाते रस-रक्त (Blood) के मार्ग में किसी प्रकार का अवरोध (Outflow obstruction);
  • हृदय में प्रविष्ट होते रस-रक्त (Blood) के मार्ग में किसी प्रकार का अवरोध (Inflow obstruction);
  • किसी कारण से हृदय को आवश्यकता से अधिक रस-रक्त (Blood) पम्प करना पड़े तो उससे पड़ने वाला अधिक दबाव (Overload);
  • किसी कारण से विश्राम (Diastole) के समय हृदय का पूरी तरह से विकसित (Relax) न हो पाना; तथा
  • हृदय की गति का अत्यधिक बढ़ना (Tachycardia) अथवा कम (Heart block / Bradycardia) होना।

अब समय था उपरोक्त विकृतियों को विस्तारपूर्वक देखने व समझने का। 

इसके लिए मैंने एक-एक विकृति को अधिक से अधिक गहनता से समझना शुरु किया।

सबसे पहले मैंने हृद्-मांस-धातु (Myocardium) की आकुञ्चन-क्षमता (Contractility) में कमी को समझने का प्रयास किया।
I. हृद्-मांस-धातु (Myocardium) की आकुञ्चन-क्षमता (Contractility) में कमी

अब प्रश्न यह उठा कि आखिर ऐसे कौन से कारण थे जो हृदय के मांस-धातु (Cardiac musculature) में दुर्बलता पैदा करके उसकी आकुञ्चन-क्षमता (Contractility) में कमी कर सकते थे।

इस दिशा में निम्न मुख्य हेतु उभर कर सामने आए – 

1. अल्प-रक्तता (Ischemia):

निश्चित तौर पर हृद्गत मांस-धातु (Myocardium) में दौर्बल्य पैदा करने वाले हेतुओं में सब से प्रमुख था –  हृदय को आवश्यकता से कम रस-रक्त (Blood) सप्लाई होना (अल्प-रक्तता – Ischemia) अथवा रस-रक्त (Blood) की सप्लाई का एकदम बन्द हो कर हृदय के एक प्रदेश का मृत होना (हृद्-कोथ – Myocardial infarction)।


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  • CAD – Angina / Old MI (हृच्छूल / जीर्ण हृद्-कोथ)
  • CVA (पक्षाघात)
  • Non-healing wounds (जीर्ण व्रण)
  • Non-healing fractures  (जीर्ण भग्न)


इनमें से अल्प-रक्तता (Ischemia) का प्रभाव दीर्घकालिक होने से जीर्ण-हृद्दौर्बल्य (Chronic heart failure) की स्थिति पैदा होती है; जबकि हृद्-कोथ (Myocardial infarction) का प्रभाव तात्कालिक होने से तीव्र-हृद्दौर्बल्य (Acute heart failure) की स्थिति पैदा होती है।

सच तो यह है कि अल्प-रक्तता (Ischemia) से प्रभावित हृदय के क्षेत्रों में उत्तरोत्तर गत्यल्पता (Dyskinesia) तथा हृद्-कोथ (Myocardial infarction) से प्रभावित क्षेत्रों में गतिक्षय (Akinesia) की स्थिति पैदा हो जाती है।

ऐसे में हृदय की आकुञ्चन-क्षमता (Contractility) में कमी होना अवश्यंभावी है।


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Ideal for the management of:
  • हृद्दौर्बल्य (Heart failure)

2. हृद्-मांस-शोथ (Myocarditis):

हृद्-मांस-धातु (Myocardium) में होने वाला शोथ Myocarditis) हृदय के मांस-धातु (Cardiac musculature) में दुर्बलता पैदा करने वाला दूसरा महत्वपूर्ण हेतु था।

यह पुनः अनेकों हेतुओं से उत्पन्न होती है, जिनमें मुख्य हैं – विषाणुजन्य संक्रमण (Viral infections), कीटाणुजन्य संक्रमण (Bacterial infections), विष (Toxins), आमविष (Immune disorders) इत्यादि । 


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Ideal for the management of:
  • विषम ज्वर (Viral infections)
  • विषम ज्वरजन्य हृद्-मांस-शोथ (Viral myocarditis)


हृद्-मांस-शोथ (Myocarditis) से हृदय का उत्तरोत्तर विकास (Progressive dilatation) होते हुए हृदय की सर्वांगीन क्रियाहीनता (Global dysfunction) होती है। 

3. हृद्-मांस-दुष्टि (Cardiomyopathy):

हृदय के मांस-धातु (Cardiac musculature) में दुर्बलता पैदा करने वाला तीसरा महत्वपूर्ण हेतु था –  हृद्-मांस-दुष्टि (Cardiomyopathy) जो पुनः कई प्रकार के संक्रमणों (Infections), विषों (Toxins),  आमविष (Immune disorders), बीज-दुष्टि (Genetic disorders) इत्यादि के परिणामस्वरूप होती है।

हृद्-मांस-शोथ (Myocarditis) की ही भाँति हृद्-मांस-दुष्टि (Cardiomyopathy) में भी हृदय का उत्तरोत्तर विकास (Progressive dilatation) होते हुए हृदय की सर्वांगीन क्रियाहीनता (Global dysfunction) होती है।

क्रमशः
डाॅ.वसिष्ठ
Dr. Sunil Vasishth
M. + 91-9419205439
Email : drvasishthsunil@gmail.com
Website : www.drvasishths.com

 

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