आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 33 ‘बी.एॅच.यू. के गरिमापूर्ण इतिहास की एक झलक’

  आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 33

‘बी.एॅच.यू. के गरिमापूर्ण इतिहास की एक झलक’

जनवरी (1982) आते-आते, एॅम. डी. (आयुर्वेद) प्रथम वर्ष की नियमित पढ़ाई ने पूरा ज़ोर पकड़ लिया था।
प्रत्येक विभाग अपने-अपने विषय को आत्मसात् कराने के लिए सम्पूर्ण निष्ठा से कार्यरत था।

नियमित पढ़ाई का बोझ इतना बढ़ता जा रहा था कि सिलेबस से इतर विषयों को पढ़ने का शौक़ पूरा करने में मुझे कठिनाई अनुभव होने लगी थी।
इसे देखते हुए मैंने अपना सम्पूर्ण ध्यान नियमित पढ़ाई पर ही केन्द्रित करने का निर्णय किया।


जनवरी के अंत तक ठण्डी में कुछ कमी व पेड़-पौधों में स्फुटित होती नव कोंपलों ने वसन्त के आगमन का उद्घोष किया।

तभी मुझे पता चला कि 30 जनवरी को वसन्त-पंचमी के कारण विश्वविद्यालय में अवकाश रहने वाला था।
मैंने उस दिन कमरे में ही रह कर, उन प्रकरणों (topics) का गहन अध्ययन करने का मन बनाया, जिन्हें मैं समयाभाव के कारण पिछले काफी समय से स्थगित करता चला आ रहा था।


वसन्त-पंचमी की पूर्व-संध्या पर, कायचिकित्सा विभाग में क्लीनिकल रजिस्ट्रार, डाॅ. एॅन. पी. राय जी ने मुझे मैस में बताया कि वसन्त-पंचमी का पर्व बी.एॅच.यू. के लिए विशेष महत्व रखता है।

कारण, इसी दिन सन् 1916 में, काशी (वाराणसी) के दक्षिण में स्थित नगवा स्थल पर बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी (BHU) की स्थापना की गई थी, तथा बी.एॅच.यू. वसन्त-पंचमी को अपने स्थापना-दिवस के रूप में मनाता है।
डा. एॅन. पी. राय जी ने मुझे आगे बताया कि इस दिन यूँ तो बी.एॅच.यू. में कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, किन्तु मुख्य कार्यक्रम नगवा स्थित ‘स्थापना-स्थल’ पर ही आयोजित करने की परिपाटी है।

मैस से कमरे तक आते-आते, मैंने अगले दिन होने वाले कार्यक्रम में भाग लेने का निर्णय कर लिया था।


प्रातः लगभग नौ बजे, मैं रिक्शा से कार्यक्रम स्थल पर पहुँच गया।
अपेक्षा से कम भीड़ देख मुझे किञ्चित् निराशा हुई ।

मैं तीसरी पंक्ति में मंच के बिल्कुल सामने बैठ कर कार्यक्रम के आरम्भ होने की प्रतीक्षा करने लगा।
कुछ समय के बाद भीड़ में हलचल हुई व कुछ विशिष्ट लोगों का एक छोटा सा काफ़िला मंच की ओर बढ़ा।
काफ़िले में अन्य गण्य-मान्य व्यक्तियों के साथ-साथ, काशी-नरेश डा. विभूति नारायण सिंह व विश्विद्यालय के कुलपति प्रो. इक़बाल नारायण मुख्य थे।

बी.एॅच.यू के संस्थापक महामना पं. मदन मोहन मालवीय जी की मूर्ति पर माल्यार्पण व बी.एॅच.यू. के कुलगीत से कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ –

कुलगीत

मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी ।
यह तीन लोकों से न्यारी काशी ।
सुज्ञान धर्म और सत्यराशी ।।
बसी है गंगा के रम्य तट पर, यह सर्वविद्या की राजधानी ।
मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी ।।
नये नहीं हैं यह ईंट पत्थर ।
है विश्वकर्मा का कार्य सुन्दर ।।
रचे हैं विद्या के भव्य मन्दिर, यह सर्वस्रष्टि की राजधानी ।
मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी ।।
यहाँ की है यह पवित्र शिक्षा ।
कि सत्य पहले फिर आत्मरक्षा ।।
बिके हरिश्चन्द्र थे यहीं पर, यह सत्यशिक्षा की राजधानी ।
मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी ।।
यह वेद ईश्वर की सत्यवानी ।
बने जिन्हें पढ के ब्रह्यज्ञानी ।।
थे व्यास जी ने रचे यहीं पर, यह ब्रह्यविद्या की राजधानी ।
मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी ।।
यह मुक्तिपद को दिलाने वाले ।
सुधर्म पथ पर चलाने वाले ।।
यहीं फले फूले बुद्ध शंकर, यह राजॠषियों की राजधानी ।
मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी ।।
सुरम्य धारायें वरुणा अस्सी ।
नहायें जिनमें कबीर तुलसी ।।
भला हो कविता का क्यों न आकर, यह वाक्विद्या की राजधानी ।
मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी ।।
विविध कला अर्थशास्त्र गायन ।
गणित खनिज औषधि रसायन ।।
प्रतीचि-प्राची का मेल सुन्दर, यह विश्वविद्या की राजधानी ।
मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी ।।
यह मालवीय जी की देशभक्ति ।
यह उनका साहस यह उनकी शक्ति ।।
प्रकट हुई है नवीन होकर, यह कर्मवीरों की राजधानी ।
मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी ।।


फिर मंच पर विराजमान सभी गण्य-मान्य व्यक्तियों के भाषण हुए।

यह पहला अवसर था जब मुझे बी.एच.यू. की स्थापना का इतिहास मालुम पड़ा जो कुछ इस प्रकार से था –
1904 में तत्कालीन काशी-नरेश हईनैस सर डाॅ. प्रभु नारायण सिंह जी की अध्यक्षता में की गई एक संगोष्ठी में इलाहाबाद के एक वकील व शिक्षाविद पं. मदन मोहन मालवीय जी ने पहली बार हिन्दू यूनिवर्सिटी की स्थापना करने का विचार विश्व के समक्ष प्रस्तुत किया ।

इस विश्वविद्यालय का उद्देश्य हिन्दू शास्त्रों के साथ-साथ आर्ट्स व विज्ञान की सभी शाखाओं का अध्ययन-अध्यापन था ताकि भारतीय युवाओं में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समुचित रूप से कार्य करने के योग्य शिक्षा व प्रशिक्षण दिया जा सके।

विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए एक करोड़ रुपये एकत्रित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया, जिसके लिए सभी भारतीयों को योगदान देने के लिए अनुरोध किया गया।

पं. मदन मोहन मालवीय जी को इस परियोजना का सचिव चुना गया, जिन्होंने 1911 में वकालत छोड़ इस लक्ष्य को पूरा करने के लिये भारत भ्रमण किया व हर ख़ास व आम से चन्दा एकत्रित करना शुरू किया ।

4 फरवरी 1916, वसन्त-पंचमी के शुभ दिन, लाॅर्ड हार्डिंग – तत्कालीन गवर्नर जनरल व वायसराय – ने भारत के अनेकों महाराजाओं, शिक्षाविदों, व अन्य गण्य-मान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में नगवा स्थल पर बी.एच.यू. की स्थापना के लिए शिलान्यास किया ।

उपस्थित हस्तियों में सर जे. सी. बोस व महात्मा गांधी भी थे।
विश्वविद्यालय का आरम्भ 1 अक्तूबर 1917 के दिन सैंट्रल हिन्दू काॅलेज को पहला घटक बना कर हुआ।
जुलाई 1918 में काॅलेज आॅफ़ ओरियंटल लर्निंग व थिओलाॅजी की स्थापना हुई, जिसमें आयुर्वेद विभाग भी आरम्भ किया गया।

1919 में इन्जीनियरिंग काॅलेज शुरु हुआ। 1921 में जिआलॅजी, माइनिंग, मैटॅलर्जी, व इन्डस्ट्रियल कैमिस्ट्री विभाग आरम्भ किये गये ।
1924-25 में स्वतंत्र रूप से आयुर्वेद का इन्स्टिच्यूट व 1928 में फैकल्टी आॅफ़ मैडिसिन एॅण्ड सर्जरी (आयुर्वेद) स्थापित किए गए ।

इस के बाद महिला महाविद्यालय, कृषि महाविद्यालय आदि बनाए गए।
इसके बाद तो अनेकों विभागों, महाविद्यालयों, व संस्थानों की स्थापना की गई, जिनका वर्णन मैं बाद में करुँगा ।
बी.एॅच.यू. के गरिमापूर्ण इतिहास ने मेरे भीतर ज़बरदस्त स्फूर्ति भर दी थी।


कार्यक्रम के सम्पन्न होने पर लौटते हुए जब मैंने बी.एच.यू. के सिंहद्वार में प्रवेश किया तो मैंने विश्व के इस अद्भुत शिक्षण स्थल के उन संस्थापकों को मन ही मन कोटि-कोटि आभार व्यक्त किया, जिनके अथक प्रयासों, परिश्रम, व त्याग के कारण ही आज मैं यहाँ शिक्षा ग्रहण कर पा रहा था…

डाॅ.वसिष्ठ
Dr. Sunil Vasishth
M. + 91-9419205439
Email : drvasishthsunil@gmail.com
Website : www.drvasishths.com

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