आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 35 – ‘आयुर्वेद के मौलिक सिद्धांत’

  आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 35 –

‘आयुर्वेद के मौलिक सिद्धांत’

वर्ष 1981-82 चिकित्सा विज्ञान संस्थान, बी.एॅच.यू. के आयुर्वेद संकाय का मौलिक सिद्धांत विभाग पूर्ण यौवन पर था।

कारण, प्रो. हरिश्चंद्र शुक्ला, प्रो. लक्ष्मीशंकर विश्वनाथ गुरु, डाॅ. गोविंद प्रसाद दुबे, डाॅ. ज्योतिर्मित्र, डाॅ. एॅल. सी. गुप्ता, व डाॅ. लक्ष्मीधर द्विवेदी सरीखे, एक से बढ़कर एक दिग्गज, विभाग को शोभायमान कर रहे थे।

ये सभी लोग अपने-अपने क्षेत्रों में विशेषज्ञ व अग्रणी थे। इनके व्याख्यान सुनना, इनकी पुस्तकें / लेख / शोध-पत्र पढ़ना, तथा इनके साथ वार्तालाप करना, अपने आप में एक विशेष अनुभव हुआ करता था। एक ऐसा अनुभव, जो किसी भी व्यक्ति के मानस-पटल पर अमिट छाप छोड़ सकता था।

मौलिक सिद्धांत विभाग के प्रत्येक शिक्षक का प्रत्येक व्याख्यान मुझे इस विषय पर गहन अध्ययन की महती प्रेरणा देता था।

मुझे इस बात पर परम आश्चर्य होता था कि सुदूर अतीत में, जब विश्व के अधिकांश भागों में सभ्यता के विकास का नामोनिशान न था, भारत के इस भूखण्ड में ब्रह्माण्ड, सृष्टि, जीवन, स्वास्थ्य, व्याधि व व्याधि-चिकित्सा से सम्बद्ध प्रत्येक पहलू पर गहन अध्ययन, विचार-विमर्श, व विश्लेषण करते हुए, अनेकों शाश्वत सिद्धांतों की स्थापना की जा चुकी थी ।

‘अद्भुत है यह भारत-भूमि व अद्भुत थे प्राचीन भारत के वे महान वैज्ञानिक (ऋषि-मुनि, आचार्य, दार्शनिक, गुरु), जिन्होंने अज्ञान के अन्धकार को ध्वस्त कर, ऐसे ज्ञान-रूपी चक्षु (वेद, उपनिषद्, दर्शन, आयुर्वेद) विश्व को भेंट कर दिए थे, जिनके आधार पर मानव आगामी युगों-युगों तक, अबाध गति से विकास-मार्ग पर दौड़ता चला जाएगा’, मैंने मन ही मन सोचा ।

अनायास मेरा शीष उन महामानवों के समक्ष श्रद्धा से झुकता चला जाता था।
हर गुजरते दिन के साथ-साथ, मुझे इस बात पर अति-गौरव की प्रतीति हुए जा रही थी कि भारत की इस पावन भूमि पर जन्म लेने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ था।

उस समय मैंने यह प्रतिज्ञा ली कि – “मैं प्राचीन भारतीय परम्पराओं का निर्वाह करते हुए, भारत की इसी देवभूमि को अपनी कर्मभूमि बनाऊँगा व यहीं से विश्व को अपना यथासम्भव योगदान दूँगा (चाहे विदेश से कितने भी सुअवसर मुझे अपनी ओर आकर्षित क्यों न करें)।”

मेरा यह परम सौभाग्य ही था कि बी.एच.यू. में मैं ऐसे गुरुजनों का शिष्य था, जो स्वयं भी आयुर्वेद की एक महान ज्ञान-परम्परा के वाहक थे, तथा जिन्होंने आयुर्वेद के पारम्परिक ज्ञान का साक्षात्कार निम्न महान गुरुओं के माध्यम से किया था –

– पद्मभूषण पं. सत्यनारायण जी शास्त्री,
– महामहोपाध्याय कविराज गणनाथ जी सेन,
– कविराज धर्मदास जी,
– कविराज प्रताप सिंह जी,
– पं. राजेश्वर दत्त जी शास्त्री,
– प्रो. भास्कर गोविंद जी घाणेकर,
– ठाकुर बलवन्त सिंह जी,
– प्रो. दत्तात्रेय कुलकर्णी जी,
– पं. यदुनन्दन जी उपाध्याय,
– प्रो. दामोदर शर्मा जी गौड़, इत्यादि ।


आयुर्वेद के इन मूर्धन्य विद्वानों की गणना, श्रद्धेय आचार्य यादवजी त्रिकमजी व उनके समकक्ष अन्य महान वैद्यों व विद्वानों में होती है, जिन्होंने अपने अथक प्रयासों व दूरदृष्टि से पारम्परिक आयुर्वेद को वर्तमान स्वरूप में लाने का हर सम्भव यत्न किया था।

इस प्रकार का दुरूह कार्य करने के लिए विश्व सदा उनका आभारी रहेगा, ऐसा मेरा मानना है ।
प्रथम पीढ़ी के इन महान गुरुओं से पारम्परिक आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात्, द्वितीय पीढ़ी के वैद्यों व शिक्षकों (मेरे गुरुजनों) ने चुप बैठने के बजाय, आयुर्वेद को वर्तमान युगानुरूप बनाने के उद्देश्य से, विज्ञान का अवलम्बन किया व इसे आधुनिक वैज्ञानिक स्वरूप देने का हर सम्भव प्रयास किया, जिससे कि यह वैज्ञानिक पृष्ठभूमि से आए विद्यार्थियों के लिए बुद्धिगम्य हो सके।

मौलिक सिद्धांत विभाग के मेरे सभी गुरुजन यही कार्य कर रहे थे।
मैं एक बात से अति-प्रभावित हुआ था, जब अपने प्रथम व्याख्यान में ही, विभाग के अध्यक्ष प्रो. हरिश्चंद्र शुक्ला जी ने यह उद्घोषणा कर दी, ‘मैं पारम्परिक रूप से पढ़ाने के बजाय यह पसन्द करुँगा कि आप लोग मौलिक सिद्धांत (या सम्पूर्ण आयुर्वेद) से सम्बंधित कोई भी प्रश्न मुझे करें, व मैं उसका उत्तर दूँगा।’

निश्चित रूप से यह उद्घोषणा चौंकाने वाली थी, क्योंकि ऐसा वचन उससे पूर्व मैंने कभी सुना न था।
प्रो. हरिश्चंद्र शुक्ला जी अपने वचन पर खरा उतरे थे । वर्ष भर हम उनसे प्रश्न करते रहे व वह अत्यंत सहज भाव से उनका उत्तर देते रहे।

विभाग के एक अन्य प्राध्यापक, प्रो. लक्ष्मीशंकर विश्वनाथ जी गुरु के अथाह ज्ञान, आत्मविश्वास, व बेबाकी से तो मैं अभिभूत था ही।
मौलिक सिद्धांत विभाग में कार्य करने से पूर्व, वह पाँच वर्ष तक बी.एॅच.यू. के मैडीकल काॅलेज में एॅम.बी.बी.एॅस. कक्षाओं को अनैटॅमी पढ़ा चुके थे । फिर उन्होंने बी.एॅच.यू. के आयुर्वेद विभाग में कई वर्ष तक प्रसूति-स्त्री रोग विभाग में पढ़ाया था।

अब वह हमें मौलिक सिद्धांत विभाग में आयुर्वेद का इतिहास पढ़ा रहे थे। उनका पढ़ाने का ढंग अत्यन्त विचारोत्तेजक व वैज्ञानिक था।

मुझे उनके इस दृष्टिकोण ने विशेष तौर पर प्रभावित किया कि – ‘आयुर्वेद को (भारत) भूमि पर लाने के लिए महर्षि भरद्वाज अपने विमान पर सवार होकर, हिमालय के किसी ऐसे दुर्गम परंतु अतिविकसित स्थल पर गए, जिसका नाम स्वर्ग था, व जिसका राजा इंद्र था’।

उनके, आयुर्वेद के इतिहास को पौराणिकता की परिधि से वास्तविकता के स्तर पर लाने से, आयुर्वेद को देखने, पढ़ने, समझने, व प्रयोग करने का मेरा दृष्टिकोण विकसित करने में मुझे बहुत अधिक बल मिला।
विभाग के चमकते सितारे तो निश्चित रूप से डाॅ. ज्योतिर्मित्र जी थे। आयुर्वेद के मौलिक सिद्धांतों के साथ-साथ वेद, पुराण, उपनिषद्, व दर्शन शास्त्र पर उनका अध्ययन बेजोड़ था। मैंने उनके समकक्ष अन्य कोई दार्शनिक आज दिन तक नहीें देखा।

मौलिक सिद्धांत विभाग के अन्य तीन शिक्षक – डाॅ. गोविंद प्रसाद जी दुबे, डाॅ. एॅल. सी. गुप्ता, व डाॅ. लक्ष्मीधर जी द्विवेदी भी अपने-अपने विषयों को अत्यंत सरलता से पढ़ाने का कार्य कर रहे थे।

मैं मानता हूँ कि मौलिक सिद्धाँत आयुर्वेद का आधार हैं तथा इन्हें सर्वोत्तम रीति से पढ़ने व पढ़ाने की आवश्यकता है ।



डाॅ.वसिष्ठ
Dr. Sunil Vasishth
M. + 91-9419205439
Email : drvasishthsunil@gmail.com
Website : www.drvasishths.com

Comments are closed.

There are no products