आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 36 ‘पंचमहाभूत-वाद, त्रिदोष-वाद’

  आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 36

‘पंचमहाभूत-वाद, त्रिदोष-वाद’

अप्रैल 1982 के अन्तिम सप्ताह की बात है। प्रो. लक्ष्मीशंकर विश्वनाथ जी गुरु हमारी कक्षा ले रहे थे। इसी दौरान उन्होंने, हिमालय के किसी दुर्गम स्थल (सम्भवतः नेपाल) में स्वर्ग नामक एक अति समृद्ध, ऐतिहासिक राष्ट्र व उसके नृपति इन्द्र के होने, तथा उनसे महर्षि भरद्वाज द्वारा आयुर्वेद सीखने की बात, एक सरसरी टिप्पणी में पुनः कही।

उनका यह कहना भर था कि मुझे सत्र के आरम्भिक दिनों का उनका वह व्याख्यान पूरी तरह से स्मरण हो आया, जिसमें उन्होंने इस सम्पूर्ण विषय पर विस्तृत चर्चा की थी।

उनकी इस अवधारणा से आयुर्वेद के उद्वभव व विकास सम्बंधी मेरे दृष्टिकोण को अत्यधिक बल मिला था।
सत्य तो यह है कि आयुर्वेद जैसे प्रायोगिक विज्ञान (Practical science) के पौराणिक उद्भव (Mythological origin) की बात आरम्भ से ही मेरे गले नहीें उतर पा रही थी।

मेरा दृढ़ विश्वास है कि, विज्ञान आस्था का नहीं अपितु परीक्षा का विषय है, जिसे अपने अस्तित्व व विकास के लिए अन्धविश्वासियों की अन्धश्रद्धा की नहीें, बल्कि हर क़दम पर परीक्षा की कसौटी पर खरा उतरने की आवश्यकता होती है ।

अब क्योंकि, आयुर्वेद भी एक (जीवन) विज्ञान है, अतः परीक्षा की कसौटी पर खरा उतरने का नियम इस पर भी लागू होना अनिवार्य है।

मज़े की बात तो यह है कि, परीक्षा की कसौटी पर खरा उतारने की बात कोई अन्य नहीें, बल्कि स्वयं आचार्य चरक, ‘परीक्ष्य कारिणो हि कुशला: भवन्ति’ के अपने वचन के माध्यम से कह चुके हैं।

परन्तु, आयुर्वेद के (काल्पनिक) स्वर्ग से भूलोक पर आने जैसी पौराणिक कथा के सामने आते ही, इसके इर्दगिर्द दिव्यता का एक ऐसा आभा-मण्डल (Aura) छा जाता है, जो इसका निष्पक्ष आकलन (Objective assessment) करने में बाधक बन जाता है।

मेरा यह सुदृढ़ विश्वास है कि इस प्रकार की मान्यता से आयुर्वेद की विश्वसनीयता (Credibility) सुदृढ़ होने के बजाय दुर्बल होती है, जिसे आधुनिक वैज्ञानिक युग में स्वीकारना कठिन है।

मैंने कई विद्वानों संग इस बारे में चर्चा करने का प्रयास किया, किन्तु अधिकांश लोगों ने मुझे हतोत्साहित करने के सिवाय और कुछ न किया था। प्रो. गुरु जी मात्र एक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने अनजाने में ही कक्षा में मेरे पक्ष का अनुमोदन कर दिया था ।

सो, मेरा उत्साहित होना स्वाभाविक ही था । इसलिए, कक्षा में बैठे-बैठे ही, कक्षा के बाद मैंने, प्रो. गुरु जी से भेंट करने व उनके समक्ष अपना पक्ष रखने का निर्णय कर लिया था।

कक्षा सम्पन्न होते ही, जहाँ मेरे अन्य सभी सहपाठी, बहिर्द्वार से व्याख्यान कक्ष से बाहर निकल रहे थे, मैं अन्तःद्वार से, दबे पाँव प्रो. गुरु जी के पीछे-पीछे उनके कक्ष की ओर चल पड़ा था।

अपने कक्ष में पहुँच कर, प्रो. गुरु जी ने उपस्थिति लेखा (Attendance register) मेज़ पर रखी व जैसे ही कुर्सी पर बैठने के लिए पीछे घूमे, तो सहसा अपने पीछे मुझे खड़ा पा कर किञ्चित् चौंक से गए।
फिर, शीघ्र ही सहज हो कर बैठते हुए, वह अपनी ओजस्वी वाणी में बोल उठे, ‘कहिएऽऽऽऽ?’

पहले तो मैं किञ्चित् सहम सा गया, फिर शीघ्रता से सँभलते हुए धीमे से बोला, ‘सर, कुछ डिस्कस करना था, अअअआप… से….।’
‘क्लास में कर लिया होता???’ उनके स्वर में कड़कपन था।

‘सर, सब के सामने डिस्कस करने में कुछ हैज़ीटेशन सी हो रही थी….. इसीलिए सोचा कि…..’ मैं कातर निग़ाहों से उनकी ओर देखते हुए बोला।
सच तो यह है कि उनका व्यक्तित्व ही कुछ इस क़दर प्रभावशाली व कड़क था कि उनके सामने आने पर अच्छे-अच्छों के होश फ़ाख़्ता हो जाया करते थे।

फिर कुछ सोचते हुए उन्होंने घड़ी पर नज़र दौड़ाई व पास पड़ी एक कुर्सी की ओर संकेत करते हुए, कुछ मद्धम स्वर में बोले, ‘बैठिए!!!’
मेरी जान में जान आई, व मैं कुर्सी पर कुछ सकुचाते हुए, धीरे से बैठ गया।

तभी विभाग का एक कर्मचारी कमरे में प्रवेश किया, प्रो. गुरु जी से कुछ काग़ज़ों पर हस्ताक्षर कराए, व वापस लौट गया।

उनसे निवृत्त हो, पैन को मेज़ पर रख कर, कुर्सी में किञ्चित् पसर कर बैठते हुए, प्रो. गुरु जी ने मेरे सम्मुख देखा व बोले, ‘कहिए, क्या समस्या है?’

‘सर, मुझे आयुर्वेद के इतिहास के बारे में कुछ बात करनी है,’ मैंने हिम्मत जुटा कर, उनकी ओर देखते हुए कहा।
‘क्या बात करनी है? कम-टु-द-पाॅयन्ट’, उन्होंने मेरी आँखों में गहराई से देखते हुए कहा ।

‘सर, आप ही की तरह मैं भी मानता हूँ कि आयुर्वेद की उद्गम-स्थली (Place of origin) – स्वर्ग, कोई ऐसा काल्पनिक स्थान नहीें है जहाँ व्यक्ति मृत्यु के पश्चात् ही पहुँच पाता है, बल्कि पृथ्वी पर ही बसा कोई ऐसा एक स्थान है, जहाँ पहुँच पाना कठिन तो हो सकता मगर असम्भव नहीें’, मैंने हिम्मत जुटा कर एक ही सांस में अपनी बात का सार उनके समक्ष प्रस्तुत कर दिया।

‘मैंने भी तो यही बताया था। इसमें डिस्कस करने वाली बात क्या है?’ उनके स्वर में हल्का सा तीखापन था।
‘सर, आपने कहा था कि यह स्थल नेपाल हो सकता है, जबकि मेरा मानना है कि आयुर्वेद की उद्गम-स्थली नेपाल न हो कर, उससे भी परे स्थित तिब्बत हो सकता है …..’ मैंने अपनी बात का वज़न बढ़ाने के उद्देश्य से, मुख पर किञ्चित् गम्भीरता लाते हुए कहा।

‘आप ऐसा किस आधार पर कह सकते हैं?’ मुख पर चिन्तन के भाव लाते हुए प्रो. गुरु जी ने पूछा ।
‘सर, इसके कई आधार हैं’, मैंने कुछ उत्साहित होते हुए कहा।
‘जैसे???’

‘सर, नेपाल की अपेक्षा तिब्बत की भौगोलिक स्थिति कहीं अधिक दुर्गम है’, मैंने उनके मुख के भाव पढ़ते हुए कहा ।
‘और???’ उनके स्वर में जिज्ञासा व मुख पर चिन्तन के बढ़ते चिह्न थे।

‘सर, सारा विश्व जानता है कि हिमालय की ऊँची-ऊँची, दुर्गम चोटियों के मध्य बसा ल्हासा, तिब्बत की राजनीतिक राजधानी के साथ-साथ कला, संस्कृति, व अध्यात्म की भी राजधानी रहा है, तथा यही कारण है कि इसकी तुलना कभी-कभी बेबीलोन, रोम, व ग्रीस सरीखे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक नगरों के साथ भी की जाती है….’ मैंने एक-एक शब्द पर ज़ोर देते हुए कहा।

प्रो. गुरु जी अत्यन्त एकाग्रता से मेरी बात सुन रहे थे।
‘यही कारण है कि जहाँ भारतीय प्रायद्वीप में ऋषि-मुनि व दार्शनिक पञ्चमहाभूत के सिद्धाँत पर चिकित्सा करते हुए, रोगों की सन्तोषजनक चिकित्सा में अपने आप को अक्षम पा रहे थे, वहीं तिब्बत (स्वर्ग) में त्रिदोष (त्रिधातु) पर आधारित त्रिस्कन्ध (त्रिस्थूण) आयुर्वेद पूरे तौर पर एक विकसित जीवन (चिकित्सा) विज्ञान के रूप में उभर कर सामने आ गया था, जिसे भारत में लाने के लिए महर्षि भरद्वाज को उस दुर्गम स्थल की यात्रा करनी पड़ी थी’, मैंने धीरे-धीरे अपने विचार उनके समक्ष प्रस्तुत कर दिए।

‘तो आपका अभिप्राय है कि त्रिदोष सिद्धाँत स्वदेशी न हो कर विदेशी है?’ प्रो. गुरु ने गहराई से मेरी आँखोः में झाँकते हुए कहा ।
‘जी! मैं ऐसा ही मानता हूँ’, मैंने धीरे से कहा।’

‘नान्सैंस! वाॅट डू यू मीन बाई दिस? यू मीन, त्रिदोष थ्योरी हैज़-बीन इम्पोर्टेड फ़्राम सम फाॅरेन लैंड?’ सहसा प्रो. गुरु जी का मुख-मण्डल रक्तिम हो उठा था।
उनका क्रोध देख, मेरा भयभीत होना स्वाभाविक ही था । फलतः, मेरे हृदय की धड़कन इस सीमा तक प्रचण्ड हो उठी कि मैं उसे गिन सकता था। खैर, तब गिनने का समय ही कहाँ था।

‘सर, माइ रिक्वैस्ट इज़, काइंडली लिसन टू माइ व्यूज़ फर्स्ट एण्ड ओनली दैन कम टू अ डिसिज़न’, मैंने विनम्रता से इस प्रकार से हर शब्द बोला कि वह कम से कम मेरी पूरी बात तो सुनें।
‘यैस, बोलो! बट स्पीक टू द पाॅयन्ट!’ उनके स्वर में किञ्चित् आई मृदुता से, मुझे मेरे अनुरोध का प्रभाव आता दिखा।

‘सर, मेरा निवेदन मात्र इतना भर है कि आपके शब्दों में आयुर्वेद हिमालय के किसी अति-दुर्गम स्थल, इन्द्र की नगरी (नेपाल) से आया है’, मैंने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा ।
‘जी हाँ’, उन्होंने अपनी बात स्वीकारते हुए कहा ।

‘तो जब सम्पूर्ण आयुर्वेद ही बाहर से आया है तो त्रिदोष सिद्धाँत भी तो विदेशी ही हुआ न?’ मैंने अपना तर्क दिया।
‘सो तो है’, वह कुछ कहते-कहते ठिठके व फिर बोले, ‘मगर उस समय की देशी-विदेशी की परिभाषा की समानता आज की देशी-विदेशी की परिभाषा से नहीं की जा सकती। स्वर्ग का मुकाबला आज के विदेशी राष्ट्रों के साथ बिल्कुल नहीं किया जा सकता ।

दोनों व्यवस्थाएँ बिल्कुल भिन्न हैं। भारत भले ही स्वर्ग से पूरी तरह से जुड़ा न था, तो भी यह एक प्रकार की महासंघीय प्रणाली थी जिसे विदेशी तो नहीें कहा जा सकता’, त्रिदोष सिद्धाँत के विदेशी होने की मेरी बात उन्हें कदाचित् भली न लगी थी।


‘सर, यदि महासंघीय व्यवस्था को एक बार मान भी लिया जाए तो प्रश्न उठता है कि यह किस प्रकार का महासंघ था, जहाँ एक ओर तो व्याधियों से पीड़ित लोग कष्ट भोग रहे थे जबकि दूसरी ओर एक परमोत्कृष्ट चिकित्सा विज्ञान फल फूल रहा था?’ मैंने पहली बार किञ्चित् निर्भीकता प्रदर्शित करते हुए अपनी बात ज़ोर देते हुए कही।
‘तो आपके अनुसार, भारत के पास अपनी कोई स्वतंत्र विचारधारा ही नहीें थी?’ उनके शब्दों में कटाक्ष था।

‘थी, मगर वह विचारधारा पाञ्चभौतिक सिद्धाँत पर आधारित थी। मेरा दृढ़ विश्वास है कि भारत में त्रिदोष सिद्धांत के आगमन से पूर्व कई प्रकार से चिकित्सा की जाती थी, परंतु उन सब विचारधाराओं में सर्वाधिक विकसित थी – पाञ्चभौतिक विचारधारा। किन्तु, पंचमहाभूतों पर आधारित यह विचारधारा संघटनात्मक थी, प्रायोगिक नहीें। अतः रोगों की चिकित्सा में यह उतनी कारगर सिद्ध न हो पा रही थी….’ मैंने अपने दृष्टिकोण को न्यायोचित ठहराते हुए कहा ।

कुछ क्षण चुप रहने के पश्चात् मैंने पुनः बोलना आरम्भ किया, ‘सौभाग्यवश, भारत के ही पड़ोस में स्थित तिब्बत ने त्रिदोष सिद्धाँत का विकास करके, पाञ्चभौतिक विचारधारा से भी अधिक प्रायोगिक विचारधारा का विकास कर लिया था, जो अधिक सरल व प्रयोग-योग्य थी। त्रिस्थूण आयुर्वेद के भारत में आगमन के पश्चात् इसका समन्वय मूल भारतीय पाञ्चभौतिक सिद्धाँत से करने का गहन प्रयास किया गया। वर्तमान आयुर्वेद त्रिदोषवाद व पञ्चमहाभूत वाद के समन्वय का ही स्वरूप है’। कह कर मैं चुप हो गया व कमरे में कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा छा गया।

प्रो. गुरु गहन विचार में खो गए प्रतीत हो रहे थे।
तभी कमरे में किसी ने प्रवेश किया व गुरुजी की विचार-तन्द्रा टूटी।
‘ठीक है, हम इस पर फिर कभी बात करेंगे’, उन्होंने मेरी ओर देखते हुए कहा व आगन्तुक से बातचीत में मग्न हो गए।
….


इस विषय पर मेरी उनसे पुनः कभी बात न हो सकी।


डाॅ.वसिष्ठ
Dr. Sunil Vasishth
M. + 91-9419205439
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Website : www.drvasishths.com

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