आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 5 ‘प्रभावो चिन्त्यम्’

  आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 5‘प्रभावो चिन्त्यम्’

चिकित्सा सफलता के लिए वैद्य श्री विष्णुदत्त जी द्वारा बताए गए 3 मुख्य भावों (सिद्धांतों) ने औषधियों के कर्मों (Pharmacological actions) व उनके प्रयोग (Therapeutic uses) को समझने के लिए मुझे एक नितांत नवीन दृष्टिकोण दे दिया था ।

इस नवीन दृष्टिकोण के आधार पर औषधियों का पुनरावलोकन करने का मेरा मन हुआ। मैंने एक बार फिर से आयुर्वेद के विभिन्न ग्रन्थों में वर्णित औषधियों का अध्ययन करना आरम्भ कर दिया ।

साथ ही मैंने आधुनिक काल में औषधियों पर हुए रिसर्च का भी अध्ययन करना आरम्भ कर दिया । इसके लिए मैंने कर्नल राम नाथ चोपड़ा, आर एन खौरी, कीर्तिकर बसु, डाॅ बामन गणेश देसाई, आदि लेखकों के ग्रन्थों का आश्रय लिया। इसके साथ-साथ मैंने उपलब्ध सम्बन्धित जर्नल्स व पत्र-पत्रिकाओं का भी सहारा लिया।

मेरे अध्ययन से 3 अभूतपूर्व तथ्य मेरे सामने आए –

1.  मुझे लगा कि उस समय तक का मेरा औषध-ज्ञान मोटे तौर पर किताबी (Theoretical) ही था, जिसका प्रायोगिक उपयोग (Practical utility) बहुत कम था;

2.  मैंने महसूस किया कि मनुष्यों की भाँति औषधियों की भी अपनी-अपनी विशिष्ट प्रकृति (Unique nature) होती है, जिसे जाने बिना चिकित्सा में उनका सही उपयोग सम्भव नहीँ है; तथा

3.  मुझे लगा कि औषधियों के कर्म (Pharmacological actions) उनमें मौजूद रस-गुण-वीर्य-विपाक-प्रभाव का परिणाम (Result / Function) होते हैं, जिनकी विवेचना औषधियों में मौजूद कार्यकारी तत्वों (Active principles) के आधार पर की जा सकती है । तथा, प्राचीन काल में सुविधाओं की कमी के कारण अचिन्त्य (Inexplicable) कहे गए प्रभाव को अब चिन्त्य की परिधि में लाने का समय आ गया है ।

एक दिन मैंने अपने ये विचार अपने एक अन्य गुरुजी के साथ शेयर किए।
मेरे इन विचारों को पूरी तरह से सुनने से पहले ही गुरुजी भड़क गए और बोले, ‘आप अपने ये क्रांतिकारी विचार अपने तक ही सीमित रखें। शास्त्र में लिखा प्रत्येक शब्द सही व अन्तिम है, तथा उसमें किसी भी प्रकार के बदलाव व सुधार का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।’

‘गुरुजी, यही बात यदि आचार्य चरक व आचार्य सुश्रुत के बाद के लोगों ने सोची होती तो आज हमारे पास आयुर्वेद के नाम पर केवल चरक संहिता व सुश्रुत संहिता ही होतीं,’ मैंने साहस बटोर कर बोल ही दिया।
‘आचार्य चरक व आचार्य सुश्रुत के बाद के आचार्य ‘आम लोग’ नहीँ बल्कि ऋषि-मुनि थे जिनका मुकाबला करना असम्भव है,’ वह मेरी ओर घूरते हुए लगभग गुर्राये।

‘यदि ऐसा है तो फिर आयुर्वेद को विज्ञान कहने के बजाय इसे धर्मशास्त्र कहना अधिक उपयुक्त होगा, क्योंकि बदलाव का निषेध धर्मशास्त्र में होता है, विज्ञान में नहीँ; विज्ञान तो एक बहती धारा है जो समयानुसार बदलती व सुधरती है। रुके हुए जल में भी सड़ांद पैदा हो जाती है।’ मैंने जैसे-तैसे हिम्मत करके के बोल ही दिया।

गुरुजी का क्रोध सातवें आसमान पर चला गया। मुझे निगल जाने वाली दृष्टि से देखते हुए वह बोले, ‘मेरे पास इन फालतू बातों के लिये समय नहीँ है।’
उनका इशारा साफ़ था। वह मुझे जाने के लिए कह रहे थे।

मैं चुपचाप उठा, उन्हें नमस्कार किया, व उनके कमरे से बाहर निकल आया ।
सांझ ढल रही थी। मेरे क़दम अनायास मेरे परमादरणीय गुरु वैद्य श्री विष्णुदत्त जी के चिकित्सालय की ओर मुड़ गए।


डाॅ.वसिष्ठ
Dr. Sunil Vasishth
M. + 91-9419205439
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Website : www.drvasishths.com

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