आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 9 ‘बी.एॅच.यू में प्रवेश की तैयारी’


आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 9

‘बी.एॅच.यू में प्रवेश की तैयारी’

कुछ दिन के बाद, अचानक काॅलेज परिसर में ही, मेरे एक वर्ष सीनियर डाॅ. योगेन्द्र शर्मा जी (Presently, Principal, RGGPG Govt Ayurvedic College, Paprola, HP) से मेरी भेंट हो गयी, जो उन दिनों BHU में कायचिकित्सा में MD (Ayurveda) के प्रथम वर्ष में थे।

मैंने उनसे अनुरोध किया कि वह मेरे लिए MD (Ayurveda) में प्रवेश के लिए एॅडमिशन फ़ार्म भेजने की कृपा करें।
डाॅ. योगेन्द्र शर्मा जी ने मेरा अनुरोध स्वीकारते हुए मुझे फ़ार्म भेजने का आश्वासन दिया।

उसके बाद तो मैं MD (Ayurveda) की तैयारी में जी जान से जुट गया।
फिर एक दिन मुझे पता चला कि बी.एच.यू. से कायचिकित्सा के एक प्राध्यापक प्रोफेसर एस. एन. त्रिपाठी किसी कार्य के लिए जम्मू पधार रहे हैं।

मैंने उनसे भेंट करके उनसे कुछ दिशानिर्देश प्राप्त करने का मन बनाया व इसमें डाॅ. उमादत्त जी शर्मा से सहयोग मांगा।
डाॅ. उमादत्त जी ने कृपा करके प्रो. त्रिपाठी जी से मेरी भेंट की व्यवस्था करने का मुझे आश्वासन दे दिया।

प्रो. त्रिपाठी जी के आने पर पता चला कि उनका कार्यक्रम अतिव्यस्त था, एवं उनके साथ विधिवत् रूप से विस्तृत भेंट व चर्चा की सम्भावना कठिन लग रही थी।
जान कर मुझे निराशा तो हुई मगर फिर भी मैंने आयुर्वैदिक काॅलेज परिसर में ही दिन भर रह कर प्रतीक्षा करने व अवसर मिलते ही कम से कम उनसे परिचय करने का निश्चय कर लिया ।

लगभग शाम के छः बजे होंगे जब चार पांच लोगों का एक छोटा सा समूह काॅलेज प्राचार्य आदरणीय प्रो. सतीश चन्द्र जी सांख्यधर के कार्यालय से बाहर निकले व मेरे पास से गुज़रे। इनमें प्रो. त्रिपाठी व डाॅ. उमादत्त जी शर्मा भी थे।

मैंने सभी को अभिवादन किया व उनके पीछे-पीछे चलने लगा।
समूह धीरे-धीरे काॅलेज द्वार की ओर बढ़ने लगा।
काॅलेज के द्वार के पास खड़ी सफ़ेद रंग की एक अम्बेस्डर कार के पास पहुँचने पर सब लोग खड़े हो गए व एक एक कर के प्रो. त्रिपाठी जी से विदा ले कर जाने लगे।

सभी के चले जाने के पश्चात् डाॅ. उमादत्त जी ने मुझे समीप आने का संकेत किया।
मैं झट से उनके पास आ गया व झुक कर प्रो. त्रिपाठी जी को अभिवादन किया ।
‘सर, यह मेरा एक स्टुडेंट है, सुनील; काफी होनहार है; बी.एच.यू. में एडमिशन की तैयारी कर रहा है व आपसे उसी संदर्भ में कुछ चर्चा करना चाहता है,’ डाॅ. उमादत्त जी ने मेरी ओर देखते हुए प्रो. त्रिपाठी जी से मेरा परिचय कराने के उद्देश्यसे कहा।

प्रो. त्रिपाठी जी ने मुस्कुराते हुए मेरी ओर देखा, फिर डाॅ. उमादत्त जी की ओर देखते हुए कहा, ‘अच्छी बात है। समय कम है, इनको साथ ले लीजिये, गाड़ी में ही बात कर लेंगे।’
फिर हम सब लोग कार में बैठ गए। मैं इस बात से बेख़बर था कि हम कहां जा रहे हैं।

कार के.सी. थियेटर की ओर मुड़ी व मेडीकल काॅलेज के पास से गुजरते हुए कैनाल की ओर बढ़ने लगी।
‘कौन से विषय में पी.जी. करने का विचार है?’ प्रो. त्रिपाठी जी ने मेरी ओर निहारते हुए कहा।
‘ज…जी कायचिकित्सा’, मैंने झिझकते हुए कहा ।

‘उमादत्त जी, जम्मू में सभी को कायचिकित्सक ही बनाएँगे क्या?’ प्रो. त्रिपाठी जी ने मुस्कुराते हुए डाॅ. उमादत्त जी की ओर देखते हुए कहा।
‘कुछ ऐसा ही है, सर। फिर दूसरे सब्जेक्ट्स में कोई ख़ास स्कोप भी तो नहीँ है।’ डाॅ. उमादत्त जी ने भी मुस्कुराते हुए बेबाकी से उत्तर दे दिया।

‘हाँ, यह बात भी सच है’, प्रो. त्रिपाठी जी ने गहरा श्वास लेते हुए कहा। ‘मगर केवल कायचिकित्सा से भी तो आयुर्वेद का सर्वांगीण विकास नहीं हो सकता न। अन्य अंगों पर भी तो ध्यान देना ही पड़ेगा। देशपांडे जी ने भी तो आख़िर क्षारसूत्र का विकास करके इसे पुनर्जीवित कर दिया है कि नहीँ।’

तभी गाड़ी कैनाल रोड पर स्थित CSIR द्वारा संचालित RRL (Regional Research Laboratory) के स्टाफ़ क्वार्टर्स की ओर मुड़ी व एक क्वार्टर के सामने आकर रुक गई, जिसके गेट पर लगी नेम प्लेट पर लिखा था – Dr. Y. K. Sarin.

किसी ने द्वार खोला व हम सभी क्वार्टर के अन्दर प्रवेश किए व एक सादगी से सजे ड्राईंग रूम में सोफा पर बैठ गए।
फिर अन्दर के कमरे से अधेड़ उम्र व मध्यम शरीर वाले एक व्यक्ति ड्राईंग रूम में प्रवेश किए। यह थे डाॅ. वाय. के. सरीन।



डाॅ.वसिष्ठ
Dr. Sunil Vasishth
M. + 91-9419205439
Email : drvasishthsunil@gmail.com
Website : www.drvasishths.com

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