आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 10 ‘वैज्ञानिक वार्तालाप – दो हस्तियों


आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 10

‘वैज्ञानिक वार्तालाप – दो हस्तियों में’

डाॅ. वाय. के. सरीन जी के कमरे में प्रवेश करते ही हम सब लोग आदरपूर्वक खड़े हो गए।
वह सीधे प्रो. त्रिपाठी जी के पास गए । प्रो. त्रिपाठी जी भी कुछ आगे बढ़े । दोनों ने एक दूसरे को पहले नमस्कार व फिर कस कर शेकहैंड किया। फिर डाॅ. सरीन जी ने डाॅ. उमादत्त जी शर्मा व मेरे साथ भी शेकहैंड किया । इसके पश्चात् हम सभी अपने-अपने स्थानों पर बैठ गए।

फिर कुछ समय तक दोनों लोग एक दूसरे से कुशल क्षेम पूछते रहे। इसी दौरान चाय नाश्ता आ गया। अगले कई मिनट इसी में निकल गए।
तभी अचानक डाॅ. सरीन जी को जैसे कुछ याद आ गया । चल रही बातचीत को बीच में ही छोड़कर उन्होंने प्रो. त्रिपाठी जी की ओर देखते हुए कहा, ‘बाइ द वे प्रो. त्रिपाठी, आप के Commiphora mukul (गूगल) वाले प्रोजेक्ट का क्या हुआ?’

‘बस चल रहा है’, प्रो. त्रिपाठी जी ने सीधे बैठते हुए कहा। ‘आजकल Commiphora और Inula racemosa ( पुष्करमूल) की कॉम्बिनेशन पर IHD में एक MD का थीसिस वर्क चल रहा है।’
‘ओ के’, डाॅ. सरीन ने सिर हिलाते हुए कहा।

‘आपके जम्मू से ही तो हैं गुप्ता जी, जो इसपे काम कर रहे हैं’, उन्होंने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा ।
‘कौन, डाॅ. विजय गुप्ता?’ डाॅ. उमादत्त जी ने उत्सुकतावश बीच में ही पूछ लिया।
‘हाँ हाँ!’ प्रो. त्रिपाठी जी ने मुस्कुराते हुए उनकी ओर देखते हुए कहा।

‘प्रिलिमनरी फाईंडिंग्स कैसी हैं?’ डाॅ. सरीन की आवाज़ में उत्सुकता स्पष्ट झलक रही थी।
‘हाईली एॅनकरेजिंग् हैं। IHD के काफ़ी सारे पेशेंट्स में ST-T में इम्प्रूवमैंट मिल रहा है।’ प्रो. त्रिपाठी जी ने सोफ़े पर कुछ सीधे बैठते हुए कहा।

‘प्रो. त्रिपाठी, Commiphora का सिलेक्शन तो इसके anti-dyslipidemic एण्ड anti-atherosclerotic होने से समझ में आता है, पर Inula racemosa तो एज़-फाॅर-एज़-आई-नो, bronchodilator है। फिर IHD में इसकी ट्रायल का लॉजिक क्या है?’ डाॅ. सरीन जी ने अपनी जिज्ञासा को शब्दों में ब्यान करते हुए कहा ।

‘डाॅ. सरीन, यह ठीक है कि Inula racemosa पर अभी तक की रिसर्च मोस्टली इसके bronchodilator action पर ही फोकस्ड रही है, जबकि एज़-ए-मैटर-आॅफ़-फैक्ट हार्ट डिज़ीज़ – ख़ास तौर पर इस्कीमिक हार्ट डिज़ीज़ (IHD) – की ट्रीटमेंट के लिए – यह आयुर्वेद की सबसे बेहतरीन मेडिसिन है।’ डाॅ. त्रिपाठी जी ने अपना पक्ष रखते हुए कहा व मेरी तरफ़ देखा।

मैंने बाॅस-इज़-आल्वेज़-राईट सिद्धांत को मानते हुए ज़ोर-ज़ोर से अपना सिर हिला कर उनकी बात की सत्यता को स्थापित करने की कोशिश की। आख़िर मुझे बी.एच.यू में MD में प्रवेश पाना था। 
डा. उमादत्त जी इस सब से बेख़बर उस दिन के टाइम्स ऑफ इंडिया के स्पोर्ट्स पेज में कहीं खो गए थे।

‘और, आजकल तो हम लोग Inula racemosa के शार्ट ऐक्शन पर काम करते हुए ऐक्यूट एन्जॉयना में इसका इफेक्ट देखा रहे हैं’, प्रो. त्रिपाठी जी ने बात को और आगे बढ़ाते हुए कहा ।
‘वह कैसे?’ कुछ-कुछ आश्चर्यचकित होते हुए डाॅ. सरीन जी ने पूछा।

‘हम पहले तो IHD के पेशेंट्स की रैस्टिंग व पोस्ट-एॅक्सरसाईज़ ECG करते हैं । फिर उन्हें Inula racemosa पाऊडर की 2 ग्राम की मात्रा देते हैं। इसके बाद अगले 3 घंटे तक, हम हर आधे घंटे के बाद उन्हें एॅक्सरसाईज़ कराते हैं व फिर ECG करते हैं’, प्रो. त्रिपाठी जी ने पूरे विषय को सरलतासे समझाने के उद्देश्य से कहा।

‘और, अभी तक की फाईंडिंग्स क्या कहती हैं,’ डाॅ. सरीन जी की उत्सुकता अब लगातार बढ़ती नज़र आ रही थी ।
‘हाईली एॅनकरेजिंग्’! प्रो. त्रिपाठी जी ने अपने विशाल चेहरे पर चौड़ी विजयी मुस्कान फैलाते हुए मेरी ओर देखते हुए कहा।

मेरा सिर निरन्तर स्वीकृति में हिले जा रहा था। 
यह देख प्रो. त्रिपाठी जी को काफ़ी अच्छा लगा । उनके चेहरे की मुस्कान और अधिक गहरी हो गई ।
फिर वह बोले, ‘बिफ़ोर ड्रग तथा आफ्टर ड्रग के ECG में ST-T में ज़बरदस्त अन्तर मिलता है। आफ्टर ड्रग ECG में ST-T की डिप्रेशन बहुत कम अथवा न के बराबर रहती है। दूसरी ओर एन्जॉयना की इन्टैन्सिटी व ड्यूरेशन में भी बहुत कमी देखी जा रही है’, प्रो. त्रिपाठी जी ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा ।

‘दैट्स वंडरफुल’, डाॅ. सरीन जी ने खुश होते हुए कहा। ‘प्रो. त्रिपाठी अगर आगे की फाईंडिंग्स में भी इसी प्रकार की कन्सीस्टन्सी बनी रहती है तो इट इज़ गोइंग टू बी ए ब्रेक थ्रू इन द मैनिजमंट आॅफ़ इस्कीमिक हार्ट डिज़ीज़’।

मेरी प्रसन्नता की सीमा न थी। उस समय आयुर्वेद जगत में इस प्रकार की बातें कम ही सुनाई देती थीं।
इससे पहले कि हम में से कोई भी व्यक्ति कोई बात करता, कमरे के एक कोने से फ़ोन बजने की आवाज़ आई। डाॅ. सरीन झट से उठे व लपक कर फ़ोन का रिसीवर उठा लिया। फिर वह किसी से बातें करने में व्यस्त हो गए ।

प्रो. त्रिपाठी जी कमरे की दीवारों पर लगे चित्रों को निहार रहे थे। डाॅ. उमादत्त जी शर्मा अभी भी स्पोर्ट्स पेज में डूबे हुए थे।

और, मैं मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था, ‘हे ईश्वर, कुछ भी कर और मुझे वहां पहुँचा जहां इस स्तर का काम होता है जिसे सुन कर RRL जैसे रिप्यूटिड वैज्ञानिक केन्द्र में इतने बड़े वैज्ञानिक भी विस्मित हो रहे हैं।’
मेरी अन्तरात्मा की गहराईयों से उठी हल्की सी एक आवाज़ ने कहा, ‘तथास्तु!’

निश्चित रूप से यह ईश्वर की ही आवाज़ थी।



डाॅ.वसिष्ठ
Dr. Sunil Vasishth
M. + 91-9419205439
Email : drvasishthsunil@gmail.com
Website : www.drvasishths.com

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