आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 11 ‘कुछ अलग करना होगा; अलग ढंग से करना ह’

  आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 11

‘कुछ अलग करना होगा; अलग ढंग से करना होगा’

डाॅ. सरीन फ़ोन पर काफ़ी देर तक किसी से वार्तालाप करते रहे। एक शब्द जो मैंने उनके मुंह से कई बार सुना, वह था – Boswellia serrata ।

फ़ोन पर अपनी बातचीत पूरी कर के वापस अपने स्थान पर बैठते हुए पहले तो उन्होंने इतनी लम्बी बातचीत करने के लिए प्रो. त्रिपाठी जी से क्षमा मांगी, व फिर बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘प्रो. त्रिपाठी, आपको तो पता ही है कि यहां RRL में Boswellia serrata पर रिसर्च वर्क चल रहा है’।

‘हाँ हाँ, मुझे अच्छी तरह पता है, यहां शल्लकी पर काफ़ी अच्छा काम हो रहा है’, प्रो. त्रिपाठी जी ने मुस्कुराते हुए कहा।

‘यह उसी के मुतल्लिक बातचीत हो रही थी। ऐक्चुअली, जब से बोसवैलिया के ऐण्टी-इन्फ्लेमेटरी इफ्फैक्ट की बात सामने आई है, बहुत से लोग व आर्गेनाइज़ेशन्ज़ इसमें काफ़ी ज़्यादा इंटरेस्ट दिखा रहे हैं। यह सज्जन उन्हीं में से एक थे’। डाॅ. सरीन ने बातचीत के विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा ।

‘वैसे डाॅ. सरीन, आपको क्या लगता है, शल्लकी का मोड-आॅफ़-ऐक्शन क्या हो सकता है?’ प्रो. त्रिपाठी जी ने बात को कुरेदने की दृष्टि से कहा।

‘प्रो. त्रिपाठी, हमारा पहला कन्सर्न मोड-आॅफ़-ऐक्शन न हो कर, यह देखना था कि क्या शल्लकी में ऐण्टी-इन्फ्लेमेटरी इफ्फैक्ट है? ऐसा इसलिए ज़रूरी था क्योंकि अनफाॅर्चुनेटली बहुत बार आयुर्वेद में ड्रग्स के क्लेम्ड इफ्फैक्टस् या तो मिलते ही नहीँ और या फिर इन्सिग्नीफिकण्ट मिलते हैं।’ कहते हुए उन्होंने कमरे में मौजूद सभी के चेहरों के भाव पढ़ने की दृष्टि से निग़ाह दौड़ाई।

हम तीनों श्रोता आयुर्वेद के बारे में उनके विचारों को आश्चर्यचकित हो उनकी ओर देख रहे थे।
फिर वह बोले, ‘अब जबकि शल्लकी का ऐण्टी-इन्फ्लेमेटरी इफ्फैक्ट लगभग इस्टैब्लिश हो चुका है, तो फोकस इसके मोड-आॅफ़-ऐक्शन का पता लगाने पर रहेगा। वैसे एक पाॅसिबिलिटी प्रोस्टैग्लैण्डिन इन्हिबिशन भी हो सकती है।’

मैं अत्यंत तन्मय हो कर उनके वचनों को सुने जा रहा था।
सच तो यह है कि मैंने बी.ए.एम.एस कोर्स के दौरान शल्लकी के बारे में इस प्रकार की कोई चर्चा कभी सुनी ही नहीँ थी और ये सारी बातें मेरे लिए पूरी तरह से नई थीं।

तभी मैंने देखा कि प्रो. त्रिपाठी जी जाने के लिए उठ खड़े हुए हैं। उन्हें खड़े होते देख डाॅ. उमादत्त जी शर्मा व मैं भी झट से खड़े हो गए।
फिर प्रो. त्रिपाठी जी ने डाॅ. सरीन जी से ‘फिर मिलेंगे’ कह कर विदाई ली तथा हम सब वापस आने के लिए कार में सवार हो गए।

ड्राइवर ने कार स्टार्ट की व हम उसी मार्ग से वापस लौटने लगे ।
रास्ते में प्रो. त्रिपाठी जी व डाॅ. उमादत्त जी आपस में कुछ हल्की-फुल्की बातचीत करते रहे। इसी बीच प्रो. त्रिपाठी जी ने ‘बनारस आएँ तो मिलिएगा’ की बात भी मुझे कही।

मगर मैं अभी भी शल्लकी पर हुई चर्चा में खोया हुआ था। मुझे रह-रह कर अपने गुरुजनों – विशेष रूप से द्रव्य गुण के प्राध्यापक डा. जे. पी. द्विवेदी जी – पर ग़िला आ रहा था कि इतनी महत्वपूर्ण औषधि – शल्लकी – के बारे में उन्होंने हमें ऐसा कुछ भी नहीें पढ़ाया था।

उस शाम मुझे लगा कि निश्चय ही बी.ए.एम.एस कोर्स में द्रव्य गुण (Ayurvedic Pharmacology & Therapeutics) को और बेहतर ढंग से पढ़ने व पढ़ाने की आवश्यकता है।
इंदिरा चौक पर एक झटके से कार रुकी। मेरी मञ्ज़िल आ चुकी थी। मैंने दोनों विभूतियों को नमस्कार किया व हार्दिक धन्यवाद देते हुए गाड़ी से नीचे उतर गया।

शाम काफ़ी ढल चुकी थी । सड़क पर इक्का-दुक्का गाड़ियाँ ही दौड़ रही थीं। मैंने कुछ देर तक सिटी बस का इंतजार किया व फिर अनायास ही अलसाए क़दमों से गाँधीनगर स्थित अपने निवास की ओर पैदल ही बढ़ने लगा।

दिन भर की प्रतीक्षा व अन्य गतिविधियों ने मेरे शरीर में हल्की सी थकान पैदा कर दी थी।


घर पहुंच कर मैंने झट से भोजन किया व भावप्रकाश निघंटु में शल्लकी का विवरण पढ़ने लगा।
शल्लकी के बारे में भावप्रकाश इतना ही कह पाए थे कि – शल्लकी के कुन्दरु, मुकुंद, सुगंध, व कुन्द प्रयाय हैं; यह मधुर, तिक्त, व तीक्ष्ण है; यह त्वच्य है; व यह ज्वर, स्वेदग्रह, अलक्ष्मी, मुखरोग, व कफ-वातहर है।

निश्चित रूप से भावप्रकाश के इस विवरण ने मुझे असंतुष्ट किया था।
मैंने लायब्रेरी में पिछले कई वर्षों में सम्पन्न रिसर्च का अध्ययन करने का मन बनाया।

अगले दिन लायब्रेरी में सबसे पहले मैंने कर्नल राम नाथ चोपड़ा जी की इन्डिजीनस ड्रग्स आॅफ़ इंडिया में शल्लकी से सम्बंधित जानकारी ढूंढने का प्रयास किया ।
कर्नल साहब केवल इतना भर कह कर चुप हो गए थे कि ‘शल्लकी diaphoretic (स्वेदजनन), diuretic (मूत्रल), व emmenagogue (आर्तवजनन) है।

इसके पश्चात् मैंने डाॅ. के. एॅम. नाडकर्णी जी की इंडियन मैटिरीया मैडिका में देखा। नाडकर्णी जी ने भी कर्नल चोपड़ा का ही विवरण दिया था।
फिर मैंने लायब्रेरी में उपलब्ध कुछ पत्र-पत्रिकाओं को उलटा-पलटा। कहीं कुछ न मिला।

मेरे मन में गहरा असन्तोष घर करता जा रहा था।
मैं मन ही मन सोच रहा था, ‘आयुर्वेद के विद्यार्थियों को वर्तमान काल में चल रही ताज़ा रिसर्च की जानकारी उपलब्ध न कराके पुराना घिसा-पिटा ज्ञान देते जाना उनके साथ एक भोंडा मज़ाक नहीँ तो और क्या है।’

वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध गहन आक्रोश से मेरा सिर फटा जा रहा था।

‘कुछ अलग करना होगा; कुछ अलग ढंग से करना होगा’, मैं धीरे से बुदबुदाया व लायब्रेरी से तेज़ क़दमों से बाहर निकल आया ।



डाॅ.वसिष्ठ
Dr. Sunil Vasishth
M. + 91-9419205439
Email : drvasishthsunil@gmail.com
Website : www.drvasishths.com

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