आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 13 ‘तू ने कर दिखाया, वत्स!’

   आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 13

‘तू ने कर दिखाया, वत्स!’

उन्हीं दिनों, एक शाम जब मैं घर पहुँचा तो मैंने पाया कि मेरी माता जी को तीव्र दन्तशूल हो रहा है।
परीक्षा करने पर मुझे उनके बाएँ निचले मोलर-टीथ में इन्फैक्शन का अंदेशा हुआ।

मैं झट से पास के मैडीकल स्टोर से कैम्पिसिलिन (ampicillin) 500 कैप्स्यूल्ज़ व आॅक्सैल्जिन (oxyphenyl-butazone + analgin) टैब्लेट्स ले आया व उनको प्रत्येक छः घण्टे पर लेने को कहा।

कुछ देर में उन्हें दन्तशूल में कमी महसूस होना शुरु हो गई ।
अगले दिन से दन्त-पुप्पुट-शोथ (gingivitis) में भी कमी दिखाई देने लगी।

अगले कुछ दिनों में माता जी बिल्कुल ठीक हो गईं ।
घर में अपनी प्रथम सफल चिकित्सा पर मैं फूला न समा रहा था ।
कुछ दिन बाद मेरे पिता जी घर आए। माता जी की दाढ़ में इन्फैक्शन की बात सुन, उन्होंने मुझसे पूछा, ‘दाँतों के डॉक्टर को दिखाया? ‘

‘नहीँ, मैंने खुद ही दवाई दी थी’, मैंने उत्साहपूर्वक कहा। अपने सफल ईलाज़ के लिए शाबाशी लेने को मैं आतुर था।
‘कौन सी दवाई दी थी?’ उन्होंने अपने चिरपरिचित रौबीले अन्दाज़ में पूछा। सेना से कई बरस पूर्व सेवानिवृत होने के बावजूद उनके फौजी अन्दाज़ में कोई परिवर्तन नहीँ आया था।

उत्तर में मैंने बचे हुए एकाध कैम्पिसिलिन कैप्स्यूल व आॅक्सैल्जिन टैब्लेट उनके आगे रख दिए।
‘ये तो ऐलोपैथिक दवाएँ लगती हैं’, उन्होंने दवाईयों को अच्छी तरह से उलट-पलट कर देखते हुए कहा।
मैं दावे से कह सकता था कि उनकी आवाज़ का टोन असामान्य हो गया था।
‘जी’, मैंने कातर दृष्टि से उनकी ओर देखते हुए अत्यन्त धीमे स्वर में कहा ।

‘आयुर्वैदिक दवाईयाँ नहीँ दीं?’, उन्होंने बात को कुरेदते हुए पूछा। उनकी आवाज़ नियंत्रित परन्तु तनावपूर्ण थी।
‘माताजी के दाँतों की रूट्स में काफ़ी इन्फैक्शन थी, जिसके कारण उन्हें मसूड़ों में सूजन व दर्द था….’ मैंने अपनी चिकित्सा को न्यायोचित ठहराते हुए कहा ।

‘फिर?’ आवाज़ का टोन बिल्कुल पहले जैसा कड़क।
‘उन्हें एॅण्टीबायटिक व पेनकिलर की सख़्त ज़रूरत थी’, मैंने स्पष्टीकरण देते हुए कहा ।
‘फिर?’ आवाज़ में सख्ती बढ़े जा रही थी ।

‘आयुर्वेद में न तो एॅण्टीबायटिक्स होती हैं तथा न असरदार पेनकिलर ही। हाँ, अफ़ीम वाली कोई दवाई दर्द दूर तो कर सकती है परन्तु उन्हें मैं अच्छा नहीँ मानता।’ मैंने सामान्य दिखने की भरसक कोशिश की ।
‘फ़िर?’ आवाज़ की कड़क कुछ और बढ़ गई थी।

‘इसीलिए मैंने… ऐलोपैथिक एॅण्टीबायटिक…. और … पेनकिलर दे दिए …’ मैंने सकुचाते हुए धीमे से कहा ।
‘तुम्हारा कहना है कि आयुर्वेद में एॅण्टीबायटिक्स और बिना अफीम के पेनकिलर नहीँ होते और इसीलिए तुमने ऐलोपैथिक एॅण्टीबायटिक और पेनकिलर दे दिए’, उन्होंने बात को स्पष्ट रूप से समझने का प्रयास करते हुए कहा ।

‘जी!’ मेरा दिल हथौड़े की माफ़िक धक्-धक् करे जा रहा था ।
इतनी देर तक चल रहे वार्तालाप में फिर पिताजी ने पहली बार नज़र दवाईयों से हटा कर मेरे चेहरे पर डाली।
मैं स्पष्ट तौर पर देख रहा था कि यह उनकी सामान्य नज़र नहीँ थी।

अपने इक्कीस बरस के जीवन में मैंने उन्हें कभी भी ऐसी निग़ाह से देखते हुए न देखा था।
मुझे समझ नहीँ पड़ रहा था कि उनकी नज़र में क्रोध था, निराशा थी, घृणा थी, उदासी थी, या कुछ और । मगर जो कुछ भी था, उनकी वह नज़र मेरे दिल के आर-पार हो गई थी ।

आज दिन तक मैं उस नज़र को भूल न पाया हूँ।
मुझे एक बात स्पष्ट हो गई थी – ‘आयुर्वेद में एॅण्टीबायटिक्स और बिना अफीम के पेनकिलर नहीँ होते’ यह बात उन्हें कहीं गहरी चोट पहुंचा गई थी।

मैंने उसी क्षण, मन ही मन यह प्रतिज्ञा ली, ‘अपने जीवनकाल में मैं कम-से-कम एक आयुर्वैदिक एॅण्टी-इन्फैक्टिव तथा एक अफीम-रहित पेनकिलर अवश्य विकसित करुँगा।’


33 बरस बाद…

13 जनवरी 2013 की शाम मैं व मेरी पत्नी डाॅ. बृजबाला वसिष्ठ लोहड़ी व मकर-संक्राँति के युग्म पर्व मनाने अहमदाबाद से जम्मू अपने घर पहुँचे।
घर में सब कुछ ठीक लग रहा था, केवल माता जी अपने बाएँ जबड़े को अपने बाएँ हाथ से दबाए, चुपचाप अपने कमरे में बिस्तर पर बैठीं थीं ।

हम दोनों ने उनके पाँव छू कर उन्हें प्रणाम किया। उन्होंने अपने दाहिने हाथ से हम लोगों को धीमे से आशीर्वाद दिया।
‘क्या बात है माता जी, तबीयत तो ठीक है न?’ मुझ से पहले डाॅ. बृजबाला जी ने किञ्चित् चिन्तित स्वर में उन्हें पूछा लिया।

‘ठीक ही है, सुबह से दाढ़ में थोड़ा दर्द है’, उन्होंने मद्धम स्वर में कहा ।
‘थोड़ा नहीँ, बहुत ज़्यादा दर्द है’, पीछे से कमरे में प्रवेश करते हुए पिता जी की आवाज़ आई।
‘कोई दवाई ली?’ मैंने कुछ परेशान हो कर ज़ल्दी से पूछा।

‘नहीँ, आप ही लोगों का इन्तज़ार कर रही हैं। कहती हैं उन्हीं से दवाई लूँगी।’ पिता जी कुछ-कुछ शिकायती लहज़े में बोले। ‘अब दवा तो दवा ठहरी, किसी से भी लीजिए, क्या फर्क पड़ता है।’
मैंने माता जी की ओर देखा । उनकी आँखों में ममता की नमीं थी। मैं जानता था किसी और को पड़े न पड़े, उन्हें फर्क़ पड़ता है। उनके लिए उनके बेटे द्वारा दी गई दवा ही सबसे बेहतरीन दवा होती है।

पिताजी तो ‘बाप’ थे, चाह कर भी माँ की ममता की गहराई को महसूस नहीें कर सकते थे।
मैं लगभग उछल कर अपने पैरों पर खड़ा हो गया । मैंने लपक कर अपना ब्रीफकेस उठाया, पास पड़ी मेज़ पर रखा, दोनों साईड-बटन्ज़ दबाए, और झटके से उसे खोला।

फिर मैंने दवाईयों के दो बाक्स निकाले, उनमें से एक-एक स्ट्रिप निकाली, दोनों स्ट्रिप्स में से दो-दो टैब्लेट्स निकाल कर माता जी की हथेली पर रखीं।
इतने में, डाॅ. बृजबाला जी ने पास पड़े जग में से कुछ पानी एक गिलास में उँडेल लिया था।

‘माता जी, आपने कुछ खाया भी है कि पेट खाली है?’ डाॅ. बृजबाला जी ने अचानक पूछा लिया । ‘खाली पेट यह दवाईयाँ नहीें ली जा सकतीं’।
‘आपके आने से थोड़ी देर पहले ही मैंने थोड़ी सी खिचड़ी खाई है’, माता जी ने धीरे से कहा और थोड़े-थोड़े अन्तर से चारों टैब्लेट्स को पानी से निगल लिया ।

फिर हम लोग आपस में बतियाने लगे। पिताजी हमारी कम्पनी से जुड़ी कई प्रकार की जानकारी ले रहे थे ।
लगभग आधे घण्टे के बाद मैंने देखा, माता जी ने अपना बायाँ हाथ अपने बाएँ जबड़े से हटा दिया था।
‘माता जी, अब दर्द कैसा है?’ डाॅ. बृजबाला जी ने धीरे से पूछा।

‘कुछ कम तो हुआ है’, उन्होंने धीरे से कहा व उठ कर बाथरूम की ओर चले गए ।
हम लोग आपस में बातें करने में फिर व्यस्त हो गए।
तभी अचानक आँगन में से दौड़ते हुए क़दमों की आहट व घुँघरुओं की छन-छन की आवाज़ आई।

हम सब उत्सुकतावश बाहर आँगन में आ गए।
अपने नन्हें-नन्हें हाथों में छड़ियां व छज्जे लिए, छोटे-छोटे बच्चों की नाचती, खिलखिलाती एक टोली घर के गेट में से प्रवेश कर, सीधे मुख्य द्वार की ओर बढ़ रही थी।

उत्तर भारत में लोहड़ी का पर्व ऐसे ही मनाते हैं।
हम सभी ने लम्बी-चौड़ी मुस्कानों से नन्हे-मुन्ने आगन्तुकों का स्वागत किया ।
कुछ देर तक दिल खोल के नाचने के बाद वे खड़े हो गए।

अब समय आ गया था उन्हें कुछ रुपये, भुञ्जी मकई, बताशे, मूँगफली, व रेबड़ियों के रूप में ईनाम देने का। यह काम तो बरसों से माता जी ही करती चली आ रही थीं, जो आज दाढ़ दर्द से बेहाल थीं।
हम सब सोच ही रहे थे कि आज इसके लिए किस की ड्यूटी लगाई जा सकती है कि तभी भीतर से किसी के आने की आहट आई।

आश्चर्यचकित हम देखते रहे कि अपने दोनों हाथों में भुञ्जी मकई, बताशों, मूँगफली, व रेबड़ियों से भरा एक थाल उठाए माता जी अपनी चिरपरिचित द्रुत चाल में चली आ रही हैं।
पास से गुजरने पर डाॅ. बृजबाला जी ने चुटकी ली, ‘माता जी, दाढ़ का दर्द?’

‘कौन सा दर्द?’ मुस्कराते हुए उन्होंने पिताजी पर उड़ती हुई एक निग़ाह डाली, मानो कह रही हों ‘यह फर्क होता है’।
फिर वह बच्चों की टोली की ओर बढ़ चलीं।

हम सभी की प्रसन्नता की सीमा न रही।
अगली सुबह मकर संक्रांति थी।
माता जी सदा की भाँति नहा धो कर पूजा-अर्चना कर रही थीं । पूजा के दौरान मैंने उनके चेहरे को ध्यानपूर्वक देखने का प्रयास किया ।

बाएँ तरफ़ के निचले जबड़े की सूजन बहुत ही कम रह गई थी ।
घर के अन्य सदस्य अपने-अपने काम में व्यस्त थे।
माघ की हल्की-हल्की धूप में मैं आँगन की क्यारियों में लगे फूलों के पौधों व बेलों को निहार रहा था जो चीरती उत्तरी ठण्ड से बेहद सिकुड़ गए थे।

थोड़ी देर बाद जब माता जी तुलसी को जल ढालने बाहर निकलीं तो मैंने उनके दाढ़ दर्द के बारे में पूछा ।
‘बहुत ही कम । समझ लो न के बराबर ।’ उन्होंने संक्षेप में कहा व तुलसी की प्रदक्षिणा करने लगीं।
तभी मैंने पिताजी को अपनी ओर आते देखा। उनके हाथ में दवाई की वही दो स्ट्रिप्स थीं जो मैंने माता जी को दी थीं।

‘ये कौन सी टैब्लेट्स हैं – INFEX और DOLID ?’ उन्होंने ध्यान से पढ़ते हुए पूछा । ‘बहुत असरदार लगती हैं। मैं तो सोच रहा था इस बार की लोहड़ी तो फ़ीकी ही रह जाएगी’
‘पिताजी INFEX Tablet इन्फैक्शन व DOLID Tablet दर्द के ईलाज़ के लिए है।’ मैंने अत्यन्त विनम्रता व सादगी से उत्तर दिया ।

‘परन्तु इस पर तो डाॅ.वसिष्ठ’स लिखा है; आप लोगों ने बनाई हैं?’ उन्होंने स्ट्रिप्स पर लिखे बारीक अक्षरों को और अधिक ध्यान से पढ़ने की कोशिश करते हुए पूछा ।
‘जी, पिताजी! DOLID तो काफी समय से चल रही है; INFEX अभी तीन-चार दिन पहले इसी 9 जनवरी को ही लांच की है’, मैंने सकुचाते हुए कहा ।

अचानक पिताजी ने अपना चेहरा उठाया । उनकी आखें छलछला आईं थीं।
और, फिर मुझे कस के गले से लगाते हुए धीरे से वह मेरे कान में फुसफुसाए, ‘तू ने कर दिखाया मेरे बेटे! मुझे तुम पे नाज है’।

फिर वह ओढ़े हुए कश्मीरी दुशाले से आँखें पोंछते हुए अपने कमरे की ओर बढ़ चले।
मुझे लगा, बरसों पहले जब मैं मन ही मन यह प्रतिज्ञा ले रहा था कि ‘अपने जीवनकाल में मैं कम-से-कम एक आयुर्वैदिक एॅण्टी-इन्फैक्टिव तथा एक अफीम-रहित पेनकिलर अवश्य विकसित करुँगा’ तो कदाचित् वह चुपके से मेरे मनोभावों को पढ़े जा रहे थे।

मुझे लगा कि हृदय तो उनका भी ममता से परिपूर्ण था, भले ही वह उसका प्रदर्शन करने में संकोच करते थे।

मैंने देखा, अपनी उम्र के इक्यासिवें बरस में, हल्की सी झुक आई उनकी कमर फिर से सीधी हो गई थी, और वह किसी विजयी योद्धा की भाँति सीना तान कर चले जा रहे थे।


डाॅ.वसिष्ठ
Dr. Sunil Vasishth
M. + 91-9419205439
Email : drvasishthsunil@gmail.com
Website : www.drvasishths.com

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