आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 15 ‘बाबा विश्वनाथ की काशी-नगरी में मेरा पहला क़दम’

  आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 15

‘बाबा विश्वनाथ की काशी-नगरी में मेरा पहला क़दम’

6 जुलाई 1981 की साँझ ढल रही थी, जब मैंने हिमगिरी ट्रेन से वाराणसी रेलवे स्टेशन पहुंच कर, बाबा विश्वनाथ की त्रिलोकी से न्यारी काशी की भूमि पर अपना पहला क़दम रखा।

मैंने झुक कर उस पावन भूमि को प्रणाम किया जहाँ लगभग सौ वर्ष पूर्व, मेरे पूर्वज (मेरे परदादा के पिताजी) ने 1870 में आयुर्वेद का अध्ययन कर जम्मू के राजदरबार में वैद्य का पद ग्रहण किया था।
मेरे संग मेरे मित्र व सहपाठी डा. कुलदीप राज कोहली भी थे।

स्टेशन से बाहर आकर हम लोगों ने बी.एॅच.यू जाने के लिए एक साईकिल-रिक्शा किया।
हमें बताया गया था कि बी.एच.यू वहाँ से लगभग 6-7 किलोमीटर की दूरी पर है।
हम लोगों ने अपना-अपना सूटकेस रिक्शा के पिछले भाग में रखा व फिर स्वयं भी बैठ गए ।

मरियल से दिखने वाले बूढ़े मुस्लिम रिक्शा चालक ने धीरे-धीरे रिक्शा आगे बढ़ाना शुरु किया।
थोड़ी देर बाद वह भी अन्य रिक्शा चालकों की भाँति पूरा ज़ोर लगा कर बनारस की सड़कों पर अपना रिक्शा दौड़ाने लगा।

उसमें आई अप्रत्याशित शक्ति पर मैं विस्मित था।
उखड़ी साँसों, पैबन्द लगी पसीने से लथपथ कमीज़, व चेहरे पर हल्की सी मुस्कान लिए वह रिक्शा चालक, ज़िन्दगी का महाभारत अत्यन्त वीरतापूर्वक लड़ता प्रतीत होता था।

बदले में उसे मिलने वाला था – पाँच रुपए का एक हरा नोट, जो हम लोगों ने रिक्शा पर बैठने से पूर्व ही उससे तय कर लिया था।
‘पाँच रुपए कम हैं’, मैंने मन ही मन कहा। ‘मैं दस तो दूँगा ही। बेचारा!’

लगभग पौन घण्टे बाद, भीड़ से भरे एक चौराहे पर, रिक्शा सहसा धीमा हो गया । लोगों को सचेत कर रास्ता बनाने के उद्देश्य से रिक्शा की घण्टियाँ तेज़ी से झनझना उठीं।
लोग इधर-उधर हटे। कुछ रास्ता बनता दिखाई दिया व रिक्शा धीरे-धीरे सरकते हुए एक विशाल सिंहद्वार में प्रविष्ट होने के लिए आगे बढ़ा।

अनायास मेरी दृष्टि उस सिंहद्वार के ऊपरी भाग पर चली गई, जिसके ऊपर विशाल अक्षरों में लिखा था –
“काशी हिन्दू विश्विद्यालय”
अपने तन-बदन में मैंने एक अभूतपूर्व सिहरन महसूस की।

तभी रिक्शा दनदनाता हुआ एक ऐसे अद्भुत परिसर में प्रवेश कर गया जिसकी मैंने कभी कल्पना भी न की थी।
‘तो यह है बी.एॅच.यू!’ मैंने मन ही मन अपने आप से कहा। ‘कुछ भी हो, अब मैं यहाँ प्रवेश पा कर ही दम लूँगा ।’

रिक्शा वुमन्स काॅलेज चौराहे पर दाहिने मुड़ा व थोड़ा आगे बढ़ा ही था कि सहसा मेरी दृष्टि बाईं ओर खड़े एक नवनिर्मित भवन पर पड़ी जिस पर लगे मध्यम आकार के पट पर लिखा था – “चिकित्सा विज्ञान संस्थान (Institute of Medical Sciences)” ।

एक बार फिर से एक सिहरन हुई – सिर से पाँव तक ।
अब तक न जाने कितनी बार मैं इस चिकित्सा विज्ञान संस्थान से जुड़ी असंख्य रोमांचकारी घटनाएँ यहाँ से पी. जी. करके जम्मू लौटे अपने वरिष्ठों व अध्यापकों – डाॅ. उमादत्त जी शर्मा, डाॅ. वी. डी. एॅस. जम्वाल, डाॅ. के. एॅल. शर्मा, डाॅ. एॅच. एॅल. साहनी, डाॅ. बलवंत सिंह जी – के मुँह से सुन चुका था ।

फिर डाॅ. कोहली ने मेरा ध्यान दाहिनी ओर खड़े एक पुराने महलनुमा भवन की ओर खींचा । यह सरसुन्दरलाल चिकित्सालय था।

थोड़ा और आगे जाने पर मैंने अपनी बाईं ओर वनस्पति उद्यान व दाहिनी ओर मालवीय भवन देखा जिसमें कई वर्ष पूर्व बी.एॅच.यू के संस्थापक महामना पं. मदन मोहन मालवीय जी रहा करते थे। इसके बाद आया कुलपति निवास ।

फिर लक्ष्मणदास गैस्ट हाऊस चौराहे पर अचानक रिक्शा दाहिनी ओर मुड़ा । अब हमारे बाएँ तरफ़ था रुईया छात्रावास व दाहिनी ओर अन्तराष्ट्रिय छात्रावास।
लगभग आधा फर्लांग की दूरी के बाद रिक्शा बाईं ओर मुड़ा व न्यू डॉक्टर्स हाॅस्टल के सामने से गुजरते हुए नागार्जुन छात्रावास के सामने झटके से रुक गया ।

हमारी मञ्ज़िल आ चुकी थी । डाॅ. योगेन्द्र शर्मा जी ने हमें यहीं आने को कहा था।
हम लोग रिक्शा से नीचे उतरे, अपने-अपने सूटकेस नीचे उतारे, मैंने रिक्शा चालक को दस का नोट थमाया (जो उसने अतिप्रसन्न हो कर रख लिया), और इधर-उधर देखने लगे ।

कई लोग छोटे-छोटे समूह बना कर छात्रावास प्रांगण में खड़े धीमे-धीमे बातचीत करने में व्यस्त थे । हमारे वहाँ पहुँचने पर कुछ क्षणों के लिए के लिए वे रुके, हम नवागन्तुकों की ओर उत्सुकता पूर्ण दृष्टि से देखा व पुनः अपने-अपने वार्तालाप में खो गए ।

मैंने अपना सूटकेस उठाया व झिझकते क़दमों से छात्रावास के भीतर प्रवेश कर गया। डाॅ. कोहली मेरे पीछे थे।
छात्रावास के दालान में खड़े दो छात्रों में से एक का ध्यान हम दोनों पर गया।

‘टैस्ट देने आए हैं? किस से मिलना है?’ उसने झट से मुझे पूछ लिया ।
‘डाॅ. योगेन्द्र शर्मा जी से …’ मैंने कुछ सकुचाते हुए धीमे स्वर में कहा ।
‘ओह! आईए मेरे साथ।’ और वह बाईं ओर की लाॅबी की ओर तेज़ डग भरता हुआ बढ़ा।

‘योगी! ओ योगी! कहाँ हो यार। अरे भई आपके गैस्ट आएँ।’ मैंने उन महाशय को तेज़ स्वर में डा. योगेन्द्र शर्मा जी को पुकारते हुए सुना।
फिर एक कमरे से मैंने डाॅ. योगेन्द्र जी को बाहर निकलते देखा।

‘कौन है, डाॅ. विनीत?’ वह अपने चिरपरिचित मृदु स्वर में बोले । फिर हम लोगों को सामने देख कर प्रसन्न हो झट से बोल उठे, ‘अरे, आ गए तुम लोग?’
हम लोगों ने एक दूसरे से गर्मजोशी से हाथ मिलाए । फिर डा. योगेन्द्र शर्मा जी हमें अपने कमरे में ले गए ।


डाॅ. योगेन्द्र शर्मा जी ने डाॅ. कोहली व मुझे अपने एक मित्र के कमरे में ठहरा दिया था जो कुछ दिन के लिए बनारस से बाहर गए थे।
छात्रावास का वातावरण मेरे लिए सर्वथा नवीन था। मैं इससे पूर्व कभी छात्रावास में नहीँ रहा था।

मैं विशेष रूप से वहाँ के उन्मुक्ततापूर्ण माहौल से प्रभावित था। जिस खुलेपन से छात्र वहाँ रह रहे थे वह मेरे लिए अत्यंत आकर्षक व लुभावना था।
अगले तीन दिन तक मैंने कमरे में ही रह कर प्रवेश परीक्षा की तैयारी में जुटे रहने का निर्णय किया ।

कदाचित् अपने अन्तर्मन की गहराईयों से उठी यह आवाज़ मैंने सुन ली थी – “बी.एॅच.यू की इस अद्भुत भूमि पर यदि अगले तीन बरस तक रह कर, यहाँ के तमाम संसाधनों का उपयोग करते हुए, जीवन में कुछ कर दिखाने के योग्य बनना है, तो अगले तीन दिनों तक जी जान से परीक्षा की तैयारी में डटे रहना होगा ।”


बरसों बाद …


अपने अब तक के जीवनकाल में मैंने अनुभव किया है कि जीवन में कुछ भी प्राप्त करने के लिए ‘लगे रहना काफ़ी नहीँ होता’; अपितु ‘निरुद्धचित्त होकर डटे रहना’ अनिवार्य होता है ।

डाॅ.वसिष्ठ
Dr. Sunil Vasishth
M. + 91-9419205439
Email : drvasishthsunil@gmail.com
Website : www.drvasishths.com

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