आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 17 ‘नई राह, अज्ञात भय’

  आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 17

‘नई राह, अज्ञात भय’





प्रवेश परीक्षा के परिणाम के बाद हमें अगस्त 1 के रोज़ एॅडमिशन के लिए उपस्थित होने का निर्देश मिला था, अतः वाराणसी से पहली ट्रेन पकड़ मैं जम्मू वापस आ गया।


एॅम. डी.(आयुर्वेद) कायचिकित्सा में प्रवेश पाने (वह भी टाॅप करते हुए) के समाचार से परिवार व कुटुम्ब के सभी सदस्य आह्लादित थे।

घर में बधाई देने आए अतिथियों का दिन भर तांता लगा रहता था। सभी प्रसन्न थे। खुशियों का माहौल था ।
केवल एक व्यक्ति ऐसा था जो प्रसन्न होने के साथ-साथ चिन्तित भी था, और वह सदस्य था – ‘मैं’ ।

माता-पिता का ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते परिवार के प्रति अपने उत्तरदायित्व को मैं भली-भाँति महसूस कर रहा था । परिवार में अपनी तीन लम्बे बरसों की अनुपस्थिति से मैं सिहर उठा था।
अज्ञात का भय मुझे निरन्तर परेशान किए जा रहा था ।

बनारस जाने दिन, सुबह सुबह मैं पिता जी के कमरे में गया। वह शेव कर रहे थे । रिटायर होने के कई बरस बाद भी सेना की आदतें उनमें जिस की तस बरक़रार थीं। हर रोज़ सुबह सवेरे शेव करना उनमें से एक था।
‘आईए!’ पिताजी ने स्नेहपूर्ण दृष्टि से मेरी ओर देखते हुए कहा ।

मैंने उनको प्रणाम किया व चुपचाप उनके पास खड़ा हो गया।
‘क्या बात है?’ उन्होंने अपनी दाहिनी गाल पर अपने बाएँ हाथ से रेज़र चलाते हुए मेरी ओर बिना देखे पूछा ।
मैं चुप रहा ।

‘क्या बात है, कुछ परेशानी है?’ उन्होंने मेरे चेहरे पर नज़रें गाड़ कर देखते हुए कहा ।
रात भर ठीक से सो न सकने के कारण कदाचित् उन्होंने मेरे चेहरे को पढ़ लिया था ।
‘जी, मैं सोच रहा हूँ कि मैं…’ कहते कहते मैं ठिठक गया।

‘हाँ, हाँ! क्या सोच रहे हो?’ उन्होंने शेव का सिलसिला जारी रखते हुए कहा ।
‘जी, मैं सोच रहा हूँ कि मैं एॅम. डी. न करुँ!’ मैंने साहस जुटा कर जैसे तैसे कह ही दिया ।
‘क्या???’ उनकी शेर सरीखी दहाड़ से मेरी टाँगों में कम्पन हो उठा।

मैं चुप रहा ।
‘मगर क्यों???’ उन्होंने रेज़र को पास पड़ी तिपाई पर रखते हुए कहा।
‘इसलिए कि मुझे परिवार की ज़िम्मेदारियाँ साफ़ दिखाई दे रही हैं’, मैं ने उनकी नज़र से नज़र मिलाते हुए कहा।
‘उसके लिए तेरा बाप अभी ज़िन्दा है!’ उन्होंने ज़ोर देते हुए कहा ।

‘मगर आप रिटायर्ड हैं’, मैंने सकुचाते हुए धीमे से कह दिया।
‘तो क्या? मैं कुछ दूसरा काम करुँगा’, उन्होंने अपने चेहरे पर परम आत्मविश्वास लाते हुए कहा।
‘मगर, मैं ऐसा नहीँ चाहता’, मेरे स्वर में भी आत्मविश्वास था।

‘मगर मैं चाहता हूँ कि तुम एॅम. डी. करो; और यह मेरा आख़िरी फैसला है। और, अब इस पर आगे कोई बहस नहीें होगी । अपने कमरे में जाओ और यात्रा की तैयारी करो। शाम को तुम्हारी गाड़ी है ।’ उन्होंने तौलिया उठाया और बाथरूम की ओर चले गए।

उनको ख़बर न थी कि उनकी आँखों में छलक आए अश्रुओं की वह पतली सी परत मैंने देख ली थी जिसे छिपाने के लिए वह मेरी ओर बिना देखे ही बाथरूम की ओर चल दिए थे।
वार्धक्य की ओर अग्रसर ‘सिंह’ बढ़ती आयु की मजबूरियों के सामने घुटने टेकने के लिए कदापि तैयार न दीख रहा था।

मैंने उनके आदेश को मानते हुए मन ही मन अपने आप से प्रतिज्ञा की – ‘भौतिक रूप से परिवार से दूरी के बावजूद मैं परिवार में अपनी उपस्थिति सदा बनाए रख कर, अपने उत्तरदायित्व को निभाने की जी जान से कोशिश करुँगा ।’


डाॅ.वसिष्ठ
Dr. Sunil Vasishth
M. + 91-9419205439
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