आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 18 ‘बी.एॅच.यू में प्रवेश’

आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 18‘बी.एॅच.यू में प्रवेश’

       29 जुलाई 1981 की शाम अन्य दिनों की अपेक्षा कुछ भिन्न थी। मुझे विदा करने आए कुटुम्बजनों से घर खचाखच भरा था।

सभी का मन भारी था क्योंकि कुटुम्ब का एक सदस्य तीन बरस के समय के लिए कुटुम्ब से दूर रहने वाला था। यद्यपि मैं बीच-बीच में, समय-समय पर घर आते-जाते रहने वाला था, तो भी एक हल्की सी उदासी का आलम तो था ही।

संयोगवश, इन्हीं तीन बरसों के दौरान कुटुम्ब में कई सारे शुभ प्रसंग होना सम्भावित थे जिन में मेरी उपस्थिति को ले कर प्रश्न चिह्न लगे हुए थे।

उदाहरण के लिए, केवल दो सप्ताह बाद ही मेरी एक कज़न का विवाह तय था जिसमें प्रत्यक्ष कारणों से मैं सम्मिलित नहीं हो पा रहा था। मेरी उस बहन की बड़ी-बड़ी आँखों में ढल आए मोटे-मोटे अश्रु मेरे पैरों को जकड़े जा रहे थे।

दूसरी ओर, सब के मन में इस बात को लेकर ढेर सारी प्रसन्नता भी थी कि एक कुटुम्बजन आयुर्वेद में उच्च शिक्षा प्राप्ति हेतु विश्व के एक ऐसे विश्विद्यालय में प्रवेश पाने जा रहा था, जो प्राचीन कालीन तक्षशिला व नालंदा विश्विद्यालयों की समकक्षता प्राप्त कर चुका था।

कुटुम्ब के कई एक सदस्य मुझे रेलवे स्टेशन पर छोड़ने के लिए जाने कि ज़िद कर रहे थे। किन्तु मैंने सभी को घर पर ही रहने का विनम्र आग्रह कर दिया था।
सच तो यह है कि एक शब्द जिसे कहने वह सुनने से मुझे बेहद डर लगता है, वह है – “अलविदा”।

फिर, जाने वाला तो गन्तव्य की ओर खुशी-खुशी चला जाता है, हाल तो घर वापस लौटने वालों का बुरा होता है। इसलिए मैं भरसक प्रयास कर रहा था कि घर से मैं अकेले ही जाऊँ व कोई भी मुझे सी-ऑफ़ करने न जाए।
5.30 बजे मैं जम्मू रेलवे स्टेशन पहुंचा। मुझे ट्रेन पर चढ़ाने केवल मेरे चाचा जी (पिताजी के ममेरे भाई) श्री प्रबोध शर्मा जी ही आए थे। प्रबोध जी मेरे हम-उम्र होने की वजह से मेरे लिए मित्रवत् थे।

सायं ठीक 6.10 बजे हिमगिरी ट्रेन ने सीटी बजाने के साथ-साथ यात्रा आरम्भ करने का उद्घोष किया।
ट्रेन धीरे-धीरे अपने गन्तव्य की ओर बढ़ने लगी । मैं दरवाजे़ पर खड़े होकर प्रबोध चाचा जी को हाथ हिला कर बाॅय-बाॅय करता रहा।

सहसा मेरी दृष्टि पश्चिम की ओर चली गई। मैंने देखा, सूर्यदेव ठीक क्षितिज पर विराजमान हो, समस्त पश्चिमी आकाश को सुनहरा व अत्यन्त मनमोहक कर रहे थे।
मैंने अपने आप से कहा, ‘निश्चित रूप से मुझे भी किसी दिन आयुर्वेद के क्षितिज पर पहुंच कर संसार को उत्तम स्वास्थ्य देकर सुनहरा व मनमोहक बनाने का प्रयास करना होगा।’

ट्रेन प्लैटफॉर्म से निकल चुकी थी, प्रबोध चाचा जी आँख से ओझल हो चुके थे, व सूर्यदेव क्षितिज के नीचे जा चुके थे।
मन में अपनों के बिछोह की उदासी व जीवन में आगे बढ़ने की खुशी के मिले-जुले भाव लिए मैं अपनी सीट पर जा बैठा ।

पास के कैबिन में से रेडियो पर गाना बजने की आवाज़ आई –
‘हम को मन की शक्ति देना मन विजय करें,
दूसरों की जय से पहले अपनी जय करें….’

मैंने मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना की – ‘मुझे शक्ति देना प्रभु! मैं चिकित्सा क्षेत्र में कुछ सार्थक योगदान अवश्य दे सकूँ।’


30 जुलाई 1981 की रात लगभग 10.30 बजे मैं वाराणसी रेलवे स्टेशन पर उतरा व उसके लगभग एक घंटे बाद रिक्शा से बी.एच.यू. के नागार्जुन हाॅस्टल पहुँचा।
अगले दिन ही हाॅस्टल के वार्डन डाॅ. जी. पी. दुबे जी ने मुझे कमरा नं. 5 आवंटित कर दिया, जिसमें अगले तीन बरस मुझे बिताने थे।

कमरे की साफ़-सफ़ाई के बाद, अपराह्न में मैं लंका (बी.एॅच.यू. के मेन गेट के बाहर का बाज़ार) से कुछ आवश्यक सामान ख़रीद लाया व कमरे को अत्यंत सादगी से व्यवस्थित कर दिया ।
1 अगस्त 1981 की प्रातः, सर सुन्दर लाल चिकित्सालय में मैडीकल परीक्षण के साथ हमारे प्रवेश की औपचारिकताएँ आरम्भ हुईं, जो अगले दिन 2 अगस्त की अपराह्न तक पूरी कर ली गईं ।

3 अगस्त से विधिवत् रूप से हमारी कक्षाएँ प्रारंभ होने वाली थीं।
हमें बताया गया कि एॅम. डी. (आयुर्वेद) के प्रथम वर्ष में हमें निम्न विषय पढ़ने होंगे –

1. Anatomy
2. Physiology + Biochemistry
3. Pathology + Microbiology
4. Pharmacology
5. Medicinal Chemistry
6. Basic Principles of Ayurveda तथा
7. Medical Statistics


इनमें से Anatomy, Physiology, Pathology, व Pharmacology की कक्षाएँ Institute of Medical Sciences की Faculty of Modern Medicine में Institute की बिल्डिंग में सम्बंधित विभागों के शिक्षकों द्वारा ली जाने वाली थीं।
मुझे समझ नहीँ आ रहा था कि बी.ए.एम.एस. कोर्स में पहले से ही पढ़ाए गए इन विषयों को पुनः पढ़ाने का क्या औचित्य है ।

पूछने पर पता चला कि भारत के विभिन्न प्रांतों के विभिन्न आयुर्वेद कालेजों में शिक्षा का स्तर असमान होने से, एॅम. डी. (आयुर्वेद) प्रथम वर्ष में उपरोक्त सभी विषयों को पुनः पढ़ा कर, एॅम. डी. (आयुर्वेद) के सभी विद्यार्थियों का शैक्षणिक स्तर एक समान करने का यहाँ प्रयास किया जाता है ।

आरम्भ में तो मुझे यह पुनरावृत्ति के सिवा कुछ न लगा; किन्तु, बाद में मुझे इस अॅप्रोच की सार्थकता का एहसास हो गया। मुझे इस बात पर बेहद शर्मिन्दगी हुई कि भारत के कई आयुर्वेद कालेजों से आए विद्यार्थियों का शैक्षणिक स्तर आवश्यकता से कहीं निम्न था।

हमें बताया गया कि इस एक वर्ष के दौरान हमें कुछ ऐसे गुरुओं से पढ़ने को मिलने वाला था जो सौभाग्यवश अपने-अपने विषय में अत्यंत निपुण, निष्णात, व समर्पित थे।

उदाहरण के लिए –
हमारे Anatomy के शिक्षक डाॅ. आर. पद्मनाभन अपने विषय को अत्यंत सरलता से पढ़ाने, समझाने, व याद कराने में अत्यंत निपुण माने जाते थे ।

Pathology की डा. रत्नमाला गुप्ता व डाॅ. पी. के. दुबे जी की गणना भी गुणवान शिक्षकों में की जाती थी।
उधर Pharmacology के डा. एस. के. भट्टाचार्य का तो पूछिए ही मत। उनके प्रशंसक तो उनकी तारीफ़ों के ढेरों पुल बांधते न थकते थे।

परन्तु, सब से ऊपर नाम था Physiology के विभागाध्यक्ष प्रो. पी. के. डे का । Ganong’s Physiology के लेखक प्रो. डब्ल्यू. एॅफ़. गैनाँग के शिष्य प्रो. डे एक विश्वप्रसिद्ध Neuro-physiologist व योगी थे । वह हमें Nervous System पढ़ाने वाले थे।

Medicinal Chemistry के डा. सी. बी. रे भी अपने क्षेत्र में एक जानी-मानी हस्ती थे।
दूसरी ओर Basic Principles के शिक्षक, विशेष रूप से प्रो. हरिश्चंद्र शुक्ला, प्रो. लक्ष्मीशंकर विश्वनाथ गुरु, व डाॅ. ज्योतिर्मित्र जी भी अपने आप में अद्वितीय थे ।

यह सब कुछ जान कर मैं अत्यंत रोमाञ्चित हुए जा रहा था। हर पल मेरी ज्ञान-पिपासा प्रबलतर हुई जा रही थी।
मैं सोच रहा था, ‘आखिरकार मुझे वे गुरुजन मिल ही गए जिनकी मुझे बी.ए.एम.एस. कोर्स के प्रथम दिवस से ही तलाश थी…


डाॅ.वसिष्ठ
Dr. Sunil Vasishth
M. + 91-9419205439
Email : drvasishthsunil@gmail.com
Website : www.drvasishths.com

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