आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 20 ‘कुछ तो करना होगा’

आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 20

‘कुछ तो करना होगा’


कक्षाएँ आरम्भ हो गईं ।

प्रतिदिन सुबह-सवेरे तैयार हो कर, प्रातः 7.30 बजे से अपराह्न 1 बजे तक, व पुनः अपराह्न 2 बजे से सायं 4 बजे तक, कक्षाओं के लिए चिकित्सा विज्ञान संस्थान (Institute of Medical Sciences) परिसर में एक विभाग से दूसरे विभाग तक भागम-भाग; अपराह्न 1 से 2 बजे के मध्य नागार्जुन हाॅस्टल की मैस में लंच के लिए दौड़ व फिर उलटे पाँव वापसी एक रूटीन बनती जा रही थी।

सब कुछ घड़ी की सुई पर चलता दीख रहा था।
दूसरी ओर कक्षा में पढ़ाया जाने वाला प्रत्येक विषय (topic) सामान्य (general) से आरम्भ हो कर तीव्र गति से विशेष (specialized) की ओर बढ़ता जाता था।

कक्षा में पढ़ाए गए सभी विषयों को पूरी तरह से जानने (know), समझने (understand), व धारण (assimilate) करने के लिए, कक्षा के बाद के समय में गहन स्वाध्याय (self-study) के द्वारा तालमेल बिठाने की परमावश्यकता थी।

एक बार पीछे छूट जाने पर पुनः तालमेल बिठा पाना दूभर था।
मेरे कई एक सहपाठी पढ़ाए जाने वाले विषयों को पूर्ण रूपेण ग्रहण करने में अपनी असमर्थता जताते हुए सहायता के लिए मुझे कई बार अनुरोध कर चुके थे ।

फिर आधुनिक विषयों के शिक्षकों के अध्यापन की अपनी विशिष्ट शैली थी।
कक्षा में आने से पूर्व सम्बन्धित विषय का अतिगहन अध्ययन करना, अनुशासित ढंग से व्यवहार करना, समयबद्ध रीति से स्वकार्य करना, व उच्चकोटि के उत्तरदायित्व का प्रदर्शन करना जैसे उनकी प्रकृति सी बन गई थी।

बदले में, वे हम से उसी स्तर की तैयारी की अपेक्षा भी रखते थे। पढ़ाए जा चुके विषयों से जुड़े किसी प्रश्न का सन्तोषजनक उत्तर न मिलने पर उनका निराश अथवा क्रुद्ध होना स्वाभाविक था ।
मुझे मेरे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के शिक्षकों की कार्यशैली पसन्द आने लगी। फलतः, धीरे-धीरे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के कई एक शिक्षक मेरे लिए अनुकरणीय बनते जा रहे थे।


सायंकाल लगभग 4.30 बजे जब थका-हारा मैं हाॅस्टल पहुँचता तो अनायास निद्रा सताने लगती। परन्तु, उस समय विश्राम कौन करने देता था?
हर रोज़ कोई न कोई सीनियर अथवा सहपाठी कमरे पर आ धमकता व इधर-उधर की निरर्थक बातों में समय बीत जाता।

फिर हाॅस्टल के दालान (foyer) अथवा लाॅबी में से ज़ोर-ज़ोर से ठहाकों व मस्ती में की जाने वाली कान-फ़ाड़ चीखो-पुकार सुनाई देने लगती।
रात्रि भोजन के समय बुभुक्षित सिंहों के समान जब छात्र क्षुधा-तृप्ति के लिए मैस में एकत्रित होते तो इकलौता ‘लालू महाराज’ व उनका सहायक ‘भूलन’ लगभग रुआँसे हो उठते।

बेचारा भूलन अपने नाम को शतशः सार्थक करते हुए किचन से वापस लौटते-लौटते सचमुच सब कुछ भूल जाता।
परिणाम-स्वरूप, रोटी मांगने वाले को दाल, दाल माँगने वाले को चावल, चावल माँगने वाले को सब्ज़ी, व सब्ज़ी माँगने वाले को सलाद मिलता।

कभी-कभी तो भोजन की प्रतीक्षा में कई-कई गिलास जल गटकने की भी नौबत आ जाती ।
फिर रात को जब अध्ययन के लिए बैठता तो एक-एक के दो-दो दीखते व निद्रा देवी बिन बुलाए अतिथि की माफ़िक ज़बरदस्ती नेत्रोन्मीलन करा देती।

मजबूरन, पुस्तकें बन्द करके सोना पड़ता।
अगले दिन फिर उसी रुटीन, उसी भागम-भाग के चक्र का पुनरावर्तन शुरू हो जाता।
कहने की आवश्यकता नहीँ कि मेरा ढेर सारा समय व्यर्थ के कामों में तेज़ी से व्यतीत हुआ जा रहा था। और, मेरी चिंता हर गुजरते दिन के साथ बढ़े जा रही थी।

‘अजीब लोग हैं’, मैंने एक दिन मेरे कमरे में आए, एक वरिष्ठ छात्र से धीरे से शिकायती लहज़े में कह दिया। ‘कितना कोलाहल मचाते हैं’।
‘लगता है आप कभी हाॅस्टल में नहीँ रहे?’ उन्होंने मेरी ओर इस प्रकार देखते हुए कहा मानो मैंने कुछ ग़लत कह दिया हो।

‘जी! मैं पहली बार हाॅस्टल में रह रहा हूँ’, मैंने उनके इस प्रकार से प्रश्न करने का कारण ढूँढने के उद्देश्य से उनकी आँखों में आँखें डालते हुए उत्तर दिया । ‘मगर आप ऐसा क्यों कर पूछ रहे हैं?’ मैंने प्रति-प्रश्न किया।
‘इसलिए कि यदि हाॅस्टल में रहने का अनुभव होता तो ऐसा न कहते’, उन्होंने मुस्कराते हुए मेरी पीठ थपथपाई । 
‘हाॅस्टल में यह सब तो चलता ही रहता है । आख़िर टाईम भी तो पास करना है’, कहते हुए वह हाॅस्टल के दालान की ओर लपके जहाँ से रह-रह कर ज़ोरदार ठहाकों की आवाज़ें आने लगी थी।

‘टाईम-पास?’, मैं अवाक् रह गया । ‘इतना टाईम ही कहाँ है जिसे पास करने के लिए इस प्रकार की हरक़तें की जानी चाहिएं? जीवन कोई हज़ार वर्ष का है क्या? मुझे तो पहले ही 24 घण्टे भी कम पड़ रहे हैं।’ मैं मन ही मन बुदबुदाया । ‘बेचारे! समय का मूल्य ही नहीँ समझते।’

कोई और कमरे में न आ जाए, इसके लिए मैं दरवाज़ा बन्द करने के लिए तेज़ी से लपका । अचानक फूटे ज़ोरदार ठहाकों ने मुझे बाहर देखने पर विवश कर दिया ।
मैंने चुपके से अधखुले दरवाजे़ में से दालान में झाँका ।

एक वरिष्ठ छात्र काग़ज़ के एक टुकड़े पर से ज़ोर-ज़ोर से कुछ पढ़े जा रहे थे व बाक़ी 4-5 लोग शोर मचाते हुए ठहाकों पे ठहाके लगाए जा रहे थे।
संयोगवश, ठहाके लगाने वालों में मेरे कमरे से अभी-अभी निकले मेरे वरिष्ठ छात्र भी सम्मिलित हो गए थे।

झल्लाहट में मैंने झट से किवाड़ बन्द कर दिया व बिस्तर पर तकिए के सहारे दीवार से पीठ सटा कर बैठ गया।
कक्षाएँ आरम्भ हुए कई दिन हो गए थे । प्रतिदिन पढ़ाए गए लेक्चर्स के साथ तालमेल न बिठा पाने के कारण मैं किञ्चित् चिन्तित हो उठा था।

‘ऐसे तो नहीँ चलने वाला’, मैंने अपने आपसे कहा। ‘कुछ तो करना होगा।’ मैंने मन ही मन सोचा। ‘मगर क्या करुँ?’
फ़िर बिज़ली की गति से एक विचार मेरे मन-मस्तिष्क में कौंध गया।

और, मैं उठ कर बैठ गया…



डाॅ.वसिष्ठ
Dr. Sunil Vasishth
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