आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 21 ‘और, कुछ कर दिया’

  आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 21

‘और, कुछ कर दिया’

हर दिन की भाँति अगले दिन भी मैं लगभग 4.30 बजे सायं अपने सहपाठियों के संग हाॅस्टल पहुँचा।
मैंने कपड़े बदले, मुँह-हाथ धो कर अपने आप को तरो-ताज़ा किया, तथा पास के रुईया छात्रावास की कैंटीन से राजनारायण के हाथों मंगवाए चाय व सुहाल (चार तह की मठरी) से स्वल्पाहार किया।

और, फिर इससे पहले कि कोई मेरे कमरे में आ धमकता, मैंने दरवाज़ा अन्दर से बोल्ट किया व गहरी नींद सो गया।

नींद को लेकर मैं परम सौभाग्यशाली रहा हूँ। कभी भी, कहीं भी, व कितनी भी देर के लिए सोने के लिए मैं जाना जाता हूँ। यह बात अलग है कि समय का भरपूर उपयोग करने हेतु, साधारणतया मैं आवश्यकता से कहीं कम नींद ले पाता हूँ।

लगभग एक घण्टे की गहरी नींद लेने के पश्चात् मैं उठा व टेबल-लैम्प जगा कर चुपचाप पढ़ने लगा ।
थोड़ी देर के बाद दरवाजे़ पर किसी ने हल्की सी दस्तक दी, परन्तु मैंने कोई प्रतिक्रया न दी।
दस्तक किञ्चित् बढ़ी, पर मैं चुपचाप बैठा रहा।

दस्तक की तीव्रता बढ़ती रही जब तक कि बाजू के कमरों से भी कुछ छात्र निकल न आए ।
पर मैं चुप था।

एक बार तो मेरी इच्छा हुई कि मैं किवाड़ खोल दूँ, मगर दूसरे ही क्षण मुझे लगा कि यदि आज मैंने दरवाज़ा खोल दिया तो जम कर पढ़ाई करने का मेरा मिशन सदा के लिए कमज़ोर हो जाएगा । सो मैं मजबूरी में चुपचाप बाहर की आवाज़ें सुनता रहा।

फिर, किसी ने दरवाजे़ पर ज़ोर-ज़ोर से लातें भी आजमाते हुए पुकारना शुरु किया, ‘डाॅक् साब! डाक् साब! अरे भई उठिए! यह कोई समय है सोने का?’
मगर मैं सोया होता, तो न जगता; मैं तो जागा हुआ था।

मेरे कमरे के दरवाज़े पर पड़ रहे लातों-घूंसों की आवाज़ सुन, बाजू के कमरा नंबर 4 से डाॅ. रमेश वर्मा जी भी बाहर निकल आए व दस्तक देने वाले महाशय को मुख़ातिब हो बोले, ‘क्या बात है, डाॅ. मिश्रा जी? काहे वदे इतना ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़ा पीटे जा रहे हैं?’

‘अरे, कुछ नहीँ डाॅक् सा’ब, हम तनी सोचत रहे कि डाॅक् सा’ब के (मेरे) साथ कुछ गप्प-सड़ाका लड़ाएँ, मगर यह श्रीमान किवाड़ खोलें, तब न।’ मेरे नए-नए बने मित्र डाॅ. यमुना प्रसाद जी मिश्रा की आवाज़ मैं पहचान रहा था।

‘अरे भई, सोने दीजिए उनको। थके होंगे बेचारे। किसी की गहरी नींद में खलल डालना उचित नहीँ है,’ डाॅ. वर्मा जी ने डाॅ. मिश्रा जी को आग्रह किया। ‘चलिए मेरे कमरे मैं बैठते हैं’।
फिर दोनों के जाते हुए क़दमों की आवाज़ मैंने सुनी।

मेरा काम हो गया था । मैं शाम को गहरी नींद सोता हूँ, यह संदेश उदित हो चुका था।
अगले कुछ ही दिनों में हाॅस्टल में मुझ से सम्बंधित लगभग प्रत्येक निवासी तक यह बात पहुँच गई कि डाॅ. सुनील (वसिष्ठ) सायंकाल गहरी नींद लेने का आदी है।

बस फिर क्या था। मैं हर रोज़ ऐसा ही करने लगा।
एक घण्टे की गहरी, विश्रामदायक निद्रा व 3-4 घण्टे के गहन अध्ययन के पश्चात् मैं रात्रि 9-10 बजे कमरे से निकलता, मैस में खाना खा कर उल्टे पाँव वापस कमरे में लौटता व पढाई का दूसरा दौर आरम्भ कर रात लगभग 1-2 बजे तक अनवरत पढ़ता रहता।

कभी-कभार कोई छात्र रात्रि-भोजन के बाद भी आ जाते, किन्तु मैं किसी न किसी बहाने उनसे पिण्ड छुड़ा ही लेता।

मैं जानता था कि सामाजिकता के मानदण्ड पर मेरा कथित व्यवहार असामाजिक माना जा सकता था, मगर उस समय मुझे इस आक्षेप की किञ्चित् मात्र भी परवाह न थी। मैं कम से कम समय में अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करना चाहता था।

परीक्षा के समय हर व्यक्ति का मानसिक तनाव बढ़ना स्वाभाविक होता है । अतः उन दिनों कोई भी छात्र किसी अन्य छात्र के कमरे में देर रात को भी जाने में झिझकता न था।

यदा-कदा तो यह स्वीकार्य हो सकता था, किन्तु फिर यह नियमित रूप से होने लगा।
एक बार पुनः मेरा माथा ठनका। इससे छुटकारा पाने के लिए मैंने अनेकों युक्तियाँ लड़ाईं, किन्तु उनमें से मेरी अधिकांश युक्तियाँ असफल ही रहीं।

एक संध्या मुझे एक ऐसा विचार सूझा जो मेरे पूर्व के विचार से भी अधिक मौलिक, क्रान्तिकारी, व प्रभावशाली सिद्ध हुआ।
दो तल वाले नागार्जुन हाॅस्टल में मेरा कमरा भूतल (ground floor) पर था। इसमें दो दरवाजे़ थे – एक, भीतर काॅरिडाॅर में खुलता था, व दूसरा, बाहर बाल्कनी में।

हाॅस्टल के प्राँगण में एक ओर बैडमिंटन कोट था व दूसरी ओर खुला मैदान था।
मेरी बाल्कनी मैदान से मात्र एक-डेढ़ फुट ही ऊँची थी व मैदान से ढाई फीट की दीवार फान्द कर, बाल्कनी में आसानी से आया जा सकता था।

अब, रात्रि-भोजन से पूर्व मैं बाल्कनी की ओर खुलने वाला द्वार भीतर से खोल देता व काॅरिडाॅर में खुलने वाले द्वार को बाहर से लॉक कर, मैस में भोजन करने चला जाता।
उस समय तक अधिकांश छात्र (विशेष रूप से भोजन-भट्ट) भोजन करके मैस से कूच कर चुके होते।

फलतः, कम समय में ही भोजन का कार्य सम्पन्न हो जाता।
यह बात अलग है कि उस समय तक, कभी सब्ज़ी तो कभी दाल, तथा कभी चावल तो कभी चपाती ख़त्म हो गए होते, व जो कुछ भी उपलब्ध होता उसी से परम-सन्तोष करना पड़ता।

घर व बाहर में यदि इतना अन्तर न होता तो व्यक्ति घर के लिए इतना अधिक क्यों तरसता?
फिर, मैस से वापस लौटने पर मैं काॅरिडाॅर की ओर न जाते हुए, हाॅस्टल के मुख्य द्वार से सीधा बाहर मैदान में चला जाता व चहल-क़दमी करने लगता।

उसके बाद, टहलते-टहलते मैं अपने कमरे की बालकनी तक आ पहुंचता व हर किसी की नज़र बचा कर, ढाई फीट की दीवार फान्द, पहले तो बालकनी में, व उसके बाद कमरे में घुस कर भीतर से दरवाज़ा बोल्ट कर देता।
यह सारा काम मैं चीते की फुर्ती से किया करता ताकि किसी को भी पता न चले।

फिर देर-रात तक मैं बिना किसी व्यवधान के एकाग्रता से अध्ययन करता।
लाॅबी की ओर ताला लगा रहने से हर आगंतुक यही मान लेता कि मैं कमरे पर नहीँ हूँ।
देर रात अध्ययन कार्य सम्पन्न कर, मैं उसी रास्ते से बाहर निकल आया करता व फिर लाॅबी में आ कर कमरे का लाॅक खोल, कमरे में चला आता।

यह सिलसिला प्रथम वर्ष की परीक्षा की सम्पन्नता तक चलता रहा।
प्रायः मेरे मित्र व सहपाठी मेरे कमरे पर देर रात तक लाॅक लगे रहने व मेरे ‘बाहर’ रहने का कारण अवश्य पूछा करते। किन्तु, मैं कुछ न कुछ मनघड़न्त कारण बता, उन्हें सन्तुष्ट कर देता।

जिस गहराई का अध्ययन मैं करना चाहता था, उसके लिए इस प्रकार के हथकण्डे अपनाना आवश्यक था।
मैं मानता हूँ कि मेरा इस प्रकार का व्यवहार अनुचित व अनैतिक श्रेणी में आ सकता है, किन्तु एकाग्रता से पढ़ाई करने की मेरी इच्छा इतनी बलवती थी कि मैंने ऐसा करने में ही अपनी व दूसरों की भलाई समझी।


यदि किसी भी व्यक्ति को मेरे इस प्रकार के व्यवहार से परेशानी हुई हो तो आज मैं पूरी विनम्रता से उनसे क्षमा चाहता हूँ…


डाॅ.वसिष्ठ
Dr. Sunil Vasishth
M. + 91-9419205439
Email : drvasishthsunil@gmail.com
Website : www.drvasishths.com

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