आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग -41

हार्ट फेलियर (Heart failure) – 3

चिकित्सा विज्ञान संस्थान के द्वितीय तल पर कदम रखते ही, इन्स्टिट्यूट कैंटीन से आ रही भोजन की मनमोहक सुगन्ध ने मेरा ज़ोरदार स्वागत किया।

मैं लम्बे डग भरता काॅरिडाॅर के अन्तिम छोर पर पहुँचा, और फिर बाएँ घूमते हुए कैंटीन के भीतर प्रवेश कर गया ।
कैंटीन हाॅल लोगों से खचाखच भरा था। इनमें से अधिकांश लोग मैडीकल फैकल्टी के एॅम.बी.बी.एॅस. तथा कुछेक माॅडर्न एॅम.डी. / एॅम.एॅस. से थे।

आयुर्वेद फैकल्टी के बस इक्का-दुक्का लोग ही थे।
मैं तेज़ कदमों से हाॅल पार करके कूपन खिड़की पर पहुँचा जहाँ 3-4 लोग पंक्ति में खड़े थे।
पंक्ति की शुरुआत में खड़े दो युवा लोग एॅम.बी.बी.एॅस. के छात्र प्रतीत हो रहे थे। वे अठखेलियाँ करते हुए आपस में बतियाए जा रहे थे। उनके पीछे व मेरे एकदम आगे खड़े एक अधेड़ सज्जन चुपचाप खड़े थे।

तभी कूपन खिड़की पर बैठा कैशियर किसी काम से भीतर किचन में चला गया। इससे आगे खड़े छात्र परेशान हो कर कुछ अंटसंट बोलने लगे थे। 
मेरे आगे खड़े सज्जन ने पीछे घूम कर मेरी ओर देखा व हल्का सा मुस्कुराए।
बदले में मैं भी हल्का सा मुस्कुरा दिया।

तभी सहसा खिड़की पर हलचल बढ़ गई । मैंने देखा, कैशियर वापस आ गया था।
फिर हम सब ने बारी-बारी पैसे दिए, कूपन लिए, व खाने की स्वयं सेवा (Self service) वाली सर्विंग विन्डो पर कूपन जमा करा कर, अपने-अपने खाने की थाली की प्रतीक्षा करने लगे।

इस दौरान मेरी उन सज्जन के साथ दो तीन बार नज़र फिर टकराई, व वह इतनी ही बार मुस्कुराए। मैं उनकी सहृदयता से प्रभावित हुए बिना न रह सका।
मैं भी उनकी हर मुस्कान का हल्की सी मुस्कान से जवाब देता रहा।

ज्यों-ज्यों मैं उनकी ओर देखता, मुझे उनका व्यक्तित्व और अधिक आकर्षक लगने लगता।
पूरी बाजू की सफेद शर्ट, काली पैंट, मध्यम देह यष्टि, गौर वर्ण, सुन्दर नाक-नक्ष, आँखों पर काले फ्रेम का नुकीला चश्मा, पैंट कि दाहिनी जेब में डाली हुई स्टैथॅस्कोप, पैंट की पिछली जेब में ठूंसा हुआ एक अंग्रेज़ी नाॅवल, एक बाजू पर टंगा काले रंग का छाता, व बोलती आँखों में ग़जब की चमक।

यह सब उन्हें अन्य सभी से हट कर, परन्तु बेहद आकर्षक बनाने के लिए काफ़ी था।
तभी उनकी थाली आ गई – अंडा करी व चावल।

उन्होंने निहायत सलीक़े से अपनी थाली उठाई व हाॅल के एक कोने में खाली पड़े टेबल पर जा बैठे।
फिर मेरी थाली भी आ गई – रोटी चावल, सब्जी व दाल। मैंने भी अपनी थाली उठाई व एक अन्य खाली टेबल पर जा बैठा।

भोजन करते-करते अचानक श्री संगम लाल जी के रोग का विचार मेरे मन में आ गया।
यह सही था कि उनके रोग का निदान – हार्ट फेलियर – स्पष्ट था। तो भी, उनको होने वाले हार्ट फेलियर की प्रतिलोम सम्प्राप्ति (Reverse pathogenesis) का अध्ययन करने की उत्कण्ठा, मेरे भीतर हर गुजरते लम्हें के साथ बढ़ती चली जाती थी।

मैंने ज़ल्दी-ज़ल्दी भोजन समाप्त किया व शीघ्रता से भूतल पर स्थित इन्स्टिट्यूट लायब्रेरी में आ गया।
मैंने एक रैक में से हैरीसन (Harrison) तथा सीसिल (Cecil) की मैडिसिन की दो पुस्तकें व हर्स्ट (Hurst) की द हार्ट (The Heart) नामक पुस्तक उठाईं, व एक कोने में खाली पड़ी टेबल पर जा बैठा।
कहने की आवश्यकता नहीं कि उस दिन मुझ पर हार्ट फेलियर (Heart Failure) के गहन अध्ययन का भूत सवार था।

हार्ट फेलियर मेरे लिए कोई नवीन विषय था, ऐसी बात नहीं थी।
बी.ए.एॅम.एॅस. कोर्स में मैंने इसे भली-भाँति पढ़ा था तथा पढ़ाने वाले भी कोई और नहीं बल्कि गवर्नमेंट मैडीकल काॅलिज, जम्मू के विद्वान प्रोफेसर्स थे ।

परन्तु, फिर भी मुझे लगता था कि इस विषय को कहीं अधिक गहराई व स्पष्टता से जानने की आवश्यकता थी, जो कम से कम स्नातक स्तर पर सम्भव नहीं थी।

अगले कई घण्टों तक मैं उपरोक्त पुस्तकों के साथ-साथ कई अन्य पुस्तकों का भी अध्ययन करता रहा।
पढ़ने का मेरा ढंग ऐसा था कि कुछ देर तक तो मैं पढ़ता, व फिर कुछ देर तक आँखें बन्द कर पढ़े हुए तथ्यों पर गहरा मनन कर उन्हें अन्तर्मन में देखने व आत्मसात् करने का प्रयास करता।

सच तो यह है कि हार्ट फेलियर सरीखे जटिल रोग की सम्पूर्ण सम्प्राप्ति को मैं सरल से सरल रीति से समझना चाहता था।

मैंने देखा कि लगभग हरेक लेखक व वैज्ञानिक ने हार्ट फेलियर को विभिन्न पहलुओं से देखने व वर्णित करने, व इसे वर्गीकृत करने का भरपूर प्रयास किया था।

उदाहरण के लिए, हार्ट फेलियर किस गति से हुआ है, उसके आधार पर इसको निम्न दो भेदों में विभक्त किया गया था –

1. Acute heart failure – अर्थात् तीव्रता से (कुछ मिनटों, घण्टों, दिनों अथवा सप्ताहों) में होने वाला हार्ट फेलियर; तथा

2. Chronic heart failure – अर्थात् धीरे-धीरे, लम्बी अवधि (महीनों अथवा वर्षों) में होने वाला हार्ट फेलियर।

एक अन्य रीति से हार्ट फेलियर को इस आधार पर विभक्त किया गया था कि हृदय का बाएँ अथवा दाहिने में से कौन सा भाग फेल (दुर्बल) हुआ है।

इस रीति से हार्ट फेलियर को निम्न भेदों में विभक्त करने की परिपाटी विकसित की गई थी –

1. Left heart (ventricular) failure – अर्थात् हार्ट का बायां (वाम) भाग दुर्बल (फेल) हो रहा था। क्योंकि, हार्ट के बाएँ भाग में महत्वपूर्ण अंग लैफ्ट वैंट्रीकल (Left ventricle) ही रहता है, अतः इसे लैफ्ट वैंट्रीक्यूलर (Left ventricular failure) भी कहते थे;

2. Right heart (ventricular) failure – अर्थात् हार्ट का दाहिना (दक्षिण) भाग दुर्बल (फेल) हो रहा था। क्योंकि, हार्ट के दाहिने भाग में महत्वपूर्ण अंग राइट वैंट्रीकल (Right ventricle) ही रहता है, अतः इसे राइट वैंट्रीक्यूलर (Right ventricular failure) भी कहते थे;

3. Biventricular failure – अर्थात् जब हार्ट का बायां (वाम) व दाहिना (दक्षिण) दोनों भाग दुर्बल (फेल) हो रहे हों, तो इसे बाइ-वैंट्रीक्यूलर (Biventricular failure) कहते थे।

हार्ट फेलियर को विभक्त करने की तीसरी रीति थी, इसे हार्ट की पम्पिंग शक्ति के आधार पर दो भेदों में बाँटना –

1. Low output heart failure – अर्थात् जब हार्ट की पम्पिंग शक्ति उत्तरोत्तर कम होती जाए व यह देह की ब्लॅड (व उसमें रहने वाली ऑक्सीजन एवं पोषक पदार्थों) सप्लाई की आवश्यकता पूरी न कर सके ; तथा

2. High output heart failure – अर्थात् जब हार्ट की पम्पिंग शक्ति तो सामान्य रहती है, परन्तु देह-धातुओं की ब्लॅड (व उसमें रहने वाली ऑक्सीजन एवं पोषक पदार्थों) की आवश्यकता बढ़ जाती है व हार्ट उस बढ़ी हुई आवश्यकता को पूरा नहीं कर पाता।

इस प्रकार, ज्यों-ज्यों मैं हार्ट फेलियर को वर्णित व विभक्त करने के विभिन्न लेखकों व वैज्ञानिकों के दृष्टिकोणों को गहराई से जानने का प्रयास करता गया, मैं अपने आप को ज्ञान के गहरे सागर में गोता लगाता हुआ महसूस करता जा रहा था। गहराई के इस गोते से महसूस होने वाला आनन्द अभूतपूर्व था व शब्दों की वर्णन शक्ति से परे था।

इस प्रकार का व इस सीमा तक के दिव्य आनन्द का अनुभव मुझे कदाचित् जीवन में पहली बार हुआ था।
हार्ट फेलियर की सम्प्राप्ति की गुत्थियाँ एक-एक कर के मेरी आँखों के सामने खुलती जा रही थीं। ऐसा लग रहा था कि सब कुछ मेरे सामने घटित हो रहा हो।

मैं टेबल पर कुहनियाँ टिकाए, अपने हाथों से बनाए कप में अपना चेहरा लिए, आँखें बन्द करके, कितनी ही देर तक उस दिव्य आनन्द की अनुभूति करता रहा।
हार्ट में होने वाली विकृतियां व अन्य तमाम डायनैमिक्स (Dynamics) परत दर परत मुझे खुलते हुए लग रहे थे।

‘इक्स्क्यूज़ मी, कुड आई हैव दिस बुक प्लीज़, इफ़ यू डोंट माइंड?’ अत्यंत मधुरता व शिष्टता से एक पुरुष आवाज़ ने मुझे मेरी तन्द्रा से बाहर खींच लिया।

मैंने देखा एक सज्जन मेरे सामने पड़ी हर्स्ट की पुस्तक ‘द हार्ट’ की ओर इशारा करके, मुझे कह रहे थे।
‘ऑफ कोर्स, सर!’ मैंने हड़बड़ाहट में आँखें खोल कर खड़े होते हुए कहा व हर्स्ट की खुली पुस्तक ‘द हार्ट’ बन्द करके उनकी ओर बढ़ा दी।

‘थैंक्यू!’ उन्होंने चेहरे पर चौड़ी सी मुस्कान लाते हुए कहा, व पुस्तक उठा कर पास के टेबल पर चले गए ।
मैंने देखा, यह वही सज्जन थे जो लंच के समय मुझे इन्स्टिट्यूट कैंटीन में मिले थे।
आखिर यह हैं कौन? सोचते हुए मैं लायब्रेरी से बाहर आ गया।

बाहर निकलते समय मेरी नज़र लायब्रेरी रिसैप्शन पर लगी दीवार घड़ी पर पड़ी।
संध्या के 8 बज चुके थे।


क्रमशः …



डाॅ.वसिष्ठ
Dr. Sunil Vasishth
M. + 91-9419205439
Email : drvasishthsunil@gmail.com

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