आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 23 ‘मौलिक सिद्धांतों का गहन ज्ञान अनिवार्य’

  आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 23

‘मौलिक सिद्धांतों का गहन ज्ञान अनिवार्य’

दिन तेज़ी से बीतने लगे।

हर बीतते दिन के साथ, मेरी यह धारणा बलवती होती चली गई कि, आयुर्वेद के मूलभूत सिद्धांतों को सम्पूर्णता से समझने व उनका चिकित्सा के लिए सफल प्रयोग करने हेतु, चिकित्सा विज्ञान की मौलिक विद्याओं – Anatomy, Physiology, Pathology, व Pharmacology – का स्पष्ट व गहन ज्ञान अनिवार्य है।

मेरे समक्ष यह पीड़ादायक तथ्य वारंवार प्रकट हुए जा रहा था कि स्नातक-स्तर पर इन विषयों की पढ़ाई सतही (superficial) व अव्यवहारिक (impractical) थी, जिसके आधार पर सम्पूर्ण चिकित्सक बन पाना कठिन था।
उदाहरणार्थ, मैं Physiology की बात करता हूँ।

बी.ए.एम.एस के दौरान हमें C. C. Chatterjee द्वारा लिखित Physiology की पुस्तक पढ़ने का परामर्श दिया गया।
हमने ऐसा ही किया।

फलतः, परीक्षा तो उत्तीर्ण हो गई, परन्तु रोगों की सम्प्राप्ति व विकृति को व्यावहारिक रूप से समझने व उसका चिकित्सा में प्रयोग करने की बुद्धि का सम्यक् विकास न हो सका।
परिणामतः, हम अपूर्ण चिकित्सक बन कर रह गए।

दूसरी ओर बी.एॅच.यू के Physiology के शिक्षकों ने हमें कई एक उच्च श्रेणी की Physiology की पुस्तकें पढ़ने का सुझाव दिया।
इन्हीं में से एक थी Physiology by Arthur C. Guyton ।

इस पुस्तक को पढ़ने के पश्चात् तो जैसे Physiology के बारे में मेरी धारणा ही बदल गई ।
कहाँ C. C. Chatterjee का वह नीरस, ऊबाऊ, व स्तरहीन लेखन, तथा कहाँ माननीय Guyton महोदय की गूढ़तम विषयों को भी सुरुचिपूर्ण रीति से परम-सरल बनाते हुए बुद्धिगम्य बनाने की अद्वितीय कला।

हर बिन्दु, हर स्तर पर आदरणीय गायटन महोदय, पाठक को चुनौती देते प्रतीत हो रहे थे – ‘न समझने की तुम लाख कोशिश कर लो; मैं तुम्हें समझा कर रहूँगा। बस, तुम पढ़ते जाओ।’
मुझे पता ही न चला, कब मैं माननीय गायटन महोदय का एकलव्य शिष्य बन गया कर, मन ही मन उनकी पूजा करने लगा था।

अपने जीवन काल में मैंने इतिहास-पुराण से लेकर क्वाॅन्टम (Quantum) फिजिक्स तक का अध्ययन किया है, किन्तु आज तलक आदरणीय गायटन महोदय जैसे उच्चतम कोटि के लेखक को नहीं पढ़ा, जो भौतिक दृष्टि से अनुपस्थित रहने के बावजूद, पाठक को अपनी उपस्थिति हर क्षण महसूस कराते हैं।

मेरी परमेच्छा थी कि कभी मैं अपने उस महानतम गुरु को मिल कर अपने इन भावों को व्यक्त करुँ, किन्तु ऐसा हो न सका।
गायटन महोदय की Physiology के संग मेरा नाता गहराता चला गया।

मैंने IMS पुस्तकालय में आयुर्वेद प्रभाग के प्रभारी श्री विश्वनाथ झा व पुस्तकालय के उपाध्यक्ष श्री गया प्रसाद सिंह जी से विशेष अनुरोध करके, गायटन महोदय की Physiology की एक प्रति सम्पूर्ण सत्र के लिए अपने नाम पर निकलवा ली।

फिर मैं रात-दिन Physiology को पढ़ने, समझने, व मन-मस्तिष्क में स्थापित करने में जुटे गया।
प्रथम वर्ष सम्पन्न होते-होते, मेरे सहपाठियों में यह बात फैल चुकी थी कि मैं Physiology के विषय को घोट कर पी गया हूँ।

धीरे-धीरे मेरे कई सहपाठी, मेरे पास Physiology पढ़ने के लिए आने लगे।
मेरे पास पढ़ने के लिए आने वाले सहपाठियों को, पूरे मनोयोग से Physiology के गूढ़तम विषयों को सरलतम बना कर बताने में मुझे दैवीय आनंद की अनुभूति होती थी। मैं जितना अधिक दूसरों को बताता, उससे कहीं अधिक ज्ञान मुझे और प्राप्त हुआ करता।

मैं मानता हूँ कि व्यक्ति को हर समय दूसरों को ज्ञान आबंटित करने में तत्पर रहना चाहिए । इससे अपना, दूसरों, व मानवता का भला होता है।


डाॅ. बृजबाला जी व मैंने यह प्रतिज्ञा ली है कि संसार छोड़ने से पूर्व हम अपना अर्जित सम्पूर्ण ज्ञान आबंटित करते देंगे – विशेष रूप से आयुर्वेद के छात्रों व युवा चिकित्सकों को – जिनको कि वरिष्ठों के ज्ञान व अनुभव की परम आवश्यकता रहती है…

डाॅ.वसिष्ठ
Dr. Sunil Vasishth
M. + 91-9419205439
Email : drvasishthsunil@gmail.com
Website : www.drvasishths.com

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