आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 24 ‘समन्वय की आवश्यकता’

आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 24

‘समन्वय की आवश्यकता’

Modern Physiology की गहराई में उतरने से मुझे एहसास हुआ कि आधुनिक जीव विज्ञान (Biology) जीवित प्राणियों (living beings) में चलने वाले समस्त कार्य-कलापों (activities) को मुख्य रूप से 7 भागों में वर्गीकृत करता है। ये हैं –

1. आहार-सेवन (Ingest)
2. आहार-पचन (Digest)
3. मलोत्सर्ग (Excrete)
4. वर्धन (Grow)
5. गति (Movement)
6. प्रजनन (Reproduce)
7. प्रतिक्रया (Respond)


स्पष्ट तौर पर यह वर्गीकरण अति-स्थूल है, व इसके आधार पर स्वास्थ्य की रक्षा व रोगों की चिकित्सा सम्यक् रूप से सम्भव नहीं है।

यही कारण है कि आधुनिक क्रिया शरीर में जीवित देह के क्रियाकलापों को कई सारे संस्थानों (systems) में विभाजित कर उन्हें समझने का प्रयास किया गया है। यथा –

1. Nervous system
2. Endocrine system
3. Circulatory system
4. Digestion & metabolism
5. Excretory system
6. Reproductive system
7. Locomotor system
8. Respiratory system
9. Hemopoietic system
10. Immune system
11. Skin, etc.


दूसरी ओर, आयुर्वेद के मनीषियों ने जीवित देह को 3 प्रमुख वर्गों में विभाजित किया है –
उन्होंने देह का धारण (व रचना) करने वाले (अपेक्षाकृत) स्थूल तत्वों (gross elements) को (सप्त)धातु (structural elements) कहा।

जीवित देह में चल रहे कार्य-कलापों के परिणाम-स्वरूप पैदा होने वाली निष्कासन योग्य तत्वों (products for excretion) को मल (waste matter) कहा।

धातुओं व मलों का संचालन करने वाले कार्यकारी तत्वों (functional elements) को (त्रि)दोष कहा।
स्पष्ट रूप से आयुर्वेद का दृष्टिकोण आधुनिक विज्ञान से कहीं अधिक वैज्ञानिक व व्यावहारिक था।

आयुर्वेद के मनीषियों ने जीवित देह के समस्त क्रिया-कलापों (activities) को आधुनिक विज्ञान की भाँति एक समान स्तर पर न रखते हुए, एक क़दम आगे बढ़ कर, उनकी महत्ता के आधार पर उन्हें विभाजित करने का प्रयास किया था, जो अत्यंत सराहनीय था।

यहाँ तक कि धातुओं व मलों का संचालन करने वाले कार्यकारी भावों (functional elements) – (त्रि)दोष – को भी प्रधान (वात) व गौण (पित्त, कफ) में विभाजित करके, वात को जीवित देह में अद्वितीय महत्व दे दिया था।
यहाँ तक तो सब कुछ ठीक लग रहा था ।

मगर, असल समस्या तब उठने लगी जब मैंने आयुर्वेदीय शरीर क्रिया का और अधिक गहनता से अध्ययन करना आरम्भ किया ।

एक बिन्दु के पश्चात् मुझे सब कुछ मीमांसात्मक (Theoretical) होता दीख रहा था, जिस पर अनुमान लगाते हुए तर्क-वितर्क तो हो सकता था, परंतु जिसका पूर्ण रूप से प्रत्यक्ष करना लगभग असम्भव था।
यह सत्य निराशा पैदा करने वाला था।

कई दिन तक मैंने इस विषय पर विचार किया, मगर कोई युक्तिसंगत समाधान न मिला ।
अन्त में मैंने आयुर्वेदीय व आधुनिक विचारधाराओं में समन्वय (synthesis) स्थापित करते हुए आगे बढ़ने का प्रयास किया।

जैसे-जैसे मैं समन्वयात्मक रीति (approach of synthesis) से आधुनिक व आयुर्वेदीय क्रिया शरीर का अध्ययन, चिन्तन, व मनन करता गया, मुझे आयुर्वेदीय शरीर क्रिया के सिद्धांत अधिकाधिक स्पष्ट होते गए ।
कभी-कभी तो मुझे लगने लगता कि Modern Physiology तो आयुर्वेदीय शरीर क्रिया का अत्याधुनिक प्रतिसंस्करण (latest edition) मात्र है।

प्रायः मुझे लगता कि आयुर्वेदीय व आधुनिक शरीर क्रिया में प्रतीत होने वाला अन्तर मात्र शब्दावली का ही था।
शब्दावली के इस अन्तर का कारण भी कुछ और नहीें अपितु देश काल ही था।

एक ओर जहाँ आयुर्वेद के सिद्धांतों का विकास सहस्रों वर्ष पूर्व, भारतीय परिवेश में, भारतीय-दर्शन के आधार पर हुआ; वहीं दूसरी ओर आधुनिक शरीर क्रिया विज्ञान का विकास, पश्चिमी परिवेश में, गत 2-3 शताब्दियों में विकसित, पाश्चात्य दर्शन पर हुआ।

दोनों दृष्टिकोणों (approaches) की विकास प्रक्रिया में देश-काल में इतना विशाल अन्तर होने के बावजूद वास्तविक अन्तर का अत्यल्प होना आश्चर्यचकित करने वाला था।
विचारधाराओं में दिखाई देने वाला यह अन्तर सम्भवतः और कम होता, यदि (ऐतिहासिक कारणों से) विज्ञान के विकास की धारा, भारत से हट कर पश्चिम की ओर न मुड़ जाती।

मुझे इस बात का पूरा एहसास है कि मेरी सोच सर्वथा काल्पनिक है, तो भी आयुर्वेदीय शरीर क्रिया के सम्यक् ज्ञान के लिए, आधुनिक व आयुर्वेदीय दृष्टिकोणों में समन्वय (synthesis) स्थापित करने के लिए इस प्रकार की सोच से सहायता मिलती है ।

उदाहरणार्थ –
धातु-पोषण के तीन न्यायों (Three Laws of Nutrition) में से एक – खले-कपोत-न्याय मुझे तब तक स्पष्ट न हुआ, जब तक कि मैंने Regulation of Blood Circulation (रक्त-संवहन का नियमन) को भली प्रकार से समझ न लिया।

आधुनिक क्रिया शरीर के अनुसार जीवित देह के किस अंग को कितना रक्त प्रवाहित होगा (Blood flow) यह फैसला वह अंग अपनी रक्त-वाहिनियों को संकुचित (vasoconstriction) या विस्फारित (vasidilation) करते हुए स्वयं करता है। फिर, रक्त-संवहन के आधार पर ही उसे अपने लिए पोषण भी प्राप्त होता है।

स्पष्ट है, इसी को आयुर्वेद में खले-कपोत-न्याय (Law of selective uptake) कहा गया है।
यही नहीं, खले-कपोत-न्याय एक अन्य क्रिया-कलाप (mechanism) की ओर भी इंगित करता है । वह है, Selective uptake of nutrients by tissues and organs – अर्थात्, धातुओं व अंगावयवों का अपनी आवश्यकता के अनुसार पोषक तत्वों को ग्रहण करना।

उदाहरणार्थ –

– रक्त-धातु द्वारा लौह तत्व (iron) का ग्रहण;
– मांस-धातु द्वारा प्रोटीन (amino acids) का ग्रहण;
– अस्थि-धातु द्वारा कैल्शियम का ग्रहण;
– मेदो-धातु द्वारा मेदस् (fat) का ग्रहण;
– थायरॉइड द्वारा आयोडीन का ग्रहण; इत्यादि ।


ज्यों-ज्यों मैं अपनी समन्वयात्मक विचारधारा (approach of synthesis) को विकसित करता गया, त्यों-त्यों आयुर्वेदीय शरीर क्रिया के गूढ़तम रहस्य एक-एक कर के मेरे समक्ष उद्घाटित होने लगे।
फिर एक दिन आयुर्वेद के एक महान विद्वान की एक अद्वितीय कृति मेरे हाथ लगी, जिसने मेरी समन्वयात्मक विचारधारा को अत्यंत नैतिक बल दिया ।

मैंने उस पुस्तक को आदि से अंत तक कई बार पढ़ा।
उस पुस्तक ने मेरी समन्वयात्मक विचारधारा को बल देने के साथ-साथ एक नई दिशा भी दी।

आयुर्वेद के वह महान विद्वान थे – प्रो. सी. द्वारकानाथ, व उनकी उस महान कृति का नाम है – Introduction to Kayachikitsa (कायचिकित्सा परिचय)…

डाॅ.वसिष्ठ
Dr. Sunil Vasishth
M. + 91-9419205439
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