आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 25 ‘हृदय व रस-रक्त-संवहन की प्रक्रिया’

आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 25

‘हृदय व रस-रक्त-संवहन की प्रक्रिया’

उन्हीं दिनों हमारे फ़िज़िऑलॅजी के शिक्षक डाॅ. आर. के. शर्मा जी ने Cardio-vascular Physiology आरम्भ करने की पूर्व सूचना दी।

डाॅ. शर्मा जी कुछ ही समय पूर्व, अमेरिका के किसी विश्विद्यालय से Physiology में Ph.D. करके भारत लौटे थे।
वह मेधावी थे, अत्यंत परिश्रमी थे, व एक भद्र पुरुष थे। उनमें यदि कोई दुर्बलता थी, तो वह थी उनमें आत्मविश्वास की कमी।

इसी कमी के कारण, मेरे द्वारा प्रश्न पूछने पर, वह कक्षा में पढ़ाते-पढ़ाते कई बार घबरा गए थे, व सन्तोषजनक उत्तर न दे पाए थे।

Cardio-vascular Physiology आरम्भ करने से कई दिन पहले मैंने उन्हें IMS Library में घण्टों तक शिद्दत से पढ़ते व लैक्चर्स की तैयारी करते देख लिया था ।

मुझे लगा उन्होंने मेरे जटिल प्रश्नों को चुनौती मानते हुए, कक्षा में पूरी तैयारी करके आने का दृढ़ निश्चय कर लिया था, ताकि वह किसी भी प्रकार की भोंडी स्थिति से बच सकें।
मुझे अच्छा लगा ।

कारण, हृदय व रक्त-संवहन (Heart & Blood Circulation) में मुझे बी.ए.एम.एस के दिनों से ही विशेष आकर्षण रहा था। किन्तु, दुर्भाग्यवश, उस समय हमारे शिक्षक महोदय के इस अति-महत्वपूर्ण विषय के साथ यथोचित न्याय न कर पाने की वजह से, उनके लैक्चर्स एक प्रकार से औपचारिकता बन कर ही रह गए थे। फलतः, हृदय व रक्त-संवहन सम्बन्धी मेरी ज्ञान-पिपासा तब अतृप्त ही रह गई थी।

और, अब मेरे लिए यह उचित अवसर था कि मैं हृदय व रस-रक्त-संवहन से सम्बंधित ज्ञान सागर में जितनी चाहूँ उतनी गहरी डुबकी लगा लूँ व ज्ञान के अमूल्य रत्न निकाल लूँ।
अतः हृदय व रस-रक्त-संवहन पर कक्षाएँ आरम्भ होने से पूर्व ही मैंने भी उतनी ही शिद्दत से अध्ययन आरम्भ कर दिया ।

दिन गुजरने के साथ मेरे प्रश्नों की जटिलता व संख्या भी बढ़ती चली गई ।
यहाँ यह बात स्पष्ट कर दूँ कि मैंने अपने जीवनकाल में प्रश्न केवल ज्ञान-संवर्धनार्थ किए हैं, ज्ञान-प्रदर्शनार्थ नहीं।
माता-पिता के पश्चात् यदि मैंने आदर किया है तो केवल अपने गुरुजनों का।

अतः मेरे कड़े अध्ययन के पीछे, मेरा एकमात्र लक्ष्य ज्ञानोपार्जन ही था।
हृदय की जिस विशेषता ने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया वह थी, बन्द मुट्ठी के आकार के, ढाई-तीन सौ ग्राम के, चार-कोष्ठकों वाले, मांस के एक लोथड़े का – आजीवन, बिना रुके, बिना अधिक बाहरी नियंत्रण के, ‘अहर्निशं सेवामहे’ के सिद्धांत पर चलते हुए स्वतः कार्य करने की इसकी अनूठी शैली।

मुझे परम-आश्चर्य होता था कि किस प्रकार देह का एक अंग, बिना रुके, हर एक सैकण्ड से भी कम (0.8 sec) समय के बाद, धड़कते हुए, निरन्तर अपनी उपस्थिति दर्शाता रहता है।

डाॅ. शर्मा जी ने पूरे मनोयोग से Physiology of the Cardio-vascular System पढ़ाना शुरु कर दिया। इसके साथ-साथ मेरे धारदार प्रश्नों की बौछार भी बढ़ती चली गई । हम दोनों का परिश्रम रंग लाने लगा।
धीरे-धीरे, हृदय व रक्त-संवहन सम्बंधी एक-एक गुत्थी सुलझती चली गई । मैं आनंद के अथाह सागर में डुबकियाँ लगाने लगा।

हृदय से जुड़े जो महत्वपूर्ण तथ्य मेरे समक्ष उजागर हुए, उनमें से कुछ तथ्य संक्षेप में इस प्रकार से थे –

1. बाहर से एक दिखने वाला हृदय (heart), वास्तव में दो हृदयों (hearts) के संयोग से बना है – दक्षिण-हृदय (left heart) व वाम-हृदय (right heart);

2. दक्षिण-हृदय (right heart) अखिल देह से वापस लौटे अशुद्ध रक्त को फुफ्फसों (lungs) में; व वाम-हृदय (left heart) फुफ्फुसों (lungs) से आए शुद्ध रक्त को अखिल देह में धकेलता है;

3. हृद्-मांस-धातु (cardiac musculature) में बिना बाहरी उत्तेजना के, स्वतः विद्युत-तरंगें (electrical impulses) उत्पन्न करने (generation) व उन्हें फैलाने (conduction) की सहज क्षमता रहती है;

4. सामान्यतः विद्युत-तरंगों की उत्पत्ति (generation) व प्रसारण (conduction) का उत्तरदायित्व हृद्गत विशिष्ट धातु (specialised conduction tissue) का होता है;

5. हृद्गत विशिष्ट-धातु (specialized conduction tissue) व्यक्ति की शारीरिक व मानसिक स्थितियों के अनुसार विद्युत-तरंगें पैदा करके हृद्-मांस-धातु का आकुञ्चन (contraction) व प्रसारण (relaxation) कराता है;

6. आकुञ्चन व प्रसारण लयबद्ध रीति (rhythmicity) से होता है;

7. विद्युत-तरंग-जनित आकुञ्चन व प्रसारण या तो समस्त हृद्-मांस-धातु में होता है अथवा कहीं भी नहीं होता (all or none phenomenon);

8. स्वतंत्र रूप से कार्य कर सकने की क्षमता के बावजूद हृदय, समस्त देह के साथ सामंजस्य स्थापित करने हेतु, मस्तिष्कगत हृदय व रस-रक्त-संवहन नियंत्रण केन्द्र (vasomotor center) के नियंत्रण में कार्य करता है;

9. हृदय, एक मिनट में समस्त (5 liters) रक्त को अपने भीतर से गुजारते हुए पूरी देह में धकेलता (pumping) रहता है, परन्तु स्वयं उसमें से कुछ नहीँ लेता; अपने लिए तो यह केवल दो छोटी-छोटी धमनियों (right & left coronary arteries) के माध्यम से, एक मिनट में लगभग 50 मि.ली. (5%) रक्त से ही सन्तोष कर लेता है;

10. श्रम के समय, हृदय एक मिनट में सामान्य से 5-7 गुणा अधिक रक्त धकेलता है, परन्तु तब भी रक्त प्राप्ति का अनुपात उतना (5%) ही रखता है; तथा

11. हृदय अपने हिस्से में आए रक्त में से अधिकांश पोषण (nutrients & oxygen) निकाल लेता है, तथा श्रम के समय इसकी अधिक पोषण की मांग को केवल रक्त की आपूर्ति (supply) बढ़ा कर ही पूरा किया जा सकता है।

डाॅ. शर्मा जी ने बताया कि हृदय सम्बन्धी उपरोक्त जानकारी, सन् 1628 में श्री विलियम हार्वे द्वारा रक्त-संवहन से जुड़े तथ्यों के प्रकाशित होने के बाद ही सम्भव हो पाई है। इसमें श्री हार्वे ने बताया था कि हृदय धमनियों (arteries) के माध्यम से रक्त को समस्त देह में धकेलता है, व रक्त सिराओं (veins) के माध्यम से वापस हृदय में लौट आता है।

दिलचस्प तथ्य तो यह है कि, श्री हार्वे धमनियों व सिराओं को जोड़ने वाली capillaries के बारे में कुछ नहीँ बता पाए थे, यद्यपि उन्होंने धमनियों व सिराओं के बीच सूक्ष्म स्रोतसों के अस्तित्व की कल्पना अवश्य की थी।

श्री हार्वे से पूर्व आधुनिक चिकित्सा विज्ञान, श्री गैलन (Galen) के द्वितीय शताब्दी के उसी पुरातन सिद्धांत को मानता चला आ रहा था, जो कहता था कि दक्षिण हृदय (right heart) से रक्त अदृश्य स्रोतसों के माध्यम से वाम हृदय (left heart) में जाता है ।

श्री हार्वे ने ऐसे अदृश्य स्रोतसों के अस्तित्व से इन्कार करते हुए बीच में फुफ्फुस-मार्ग (From right heart blood goes to the lungs, and comes back to the left heart) का सत्य उद्घाटित कर दिया था ।

चिकित्सा विज्ञान को दिए इसी योगदान के आधार पर ही श्री विलियम हार्वे को Cardiology का पिता माना जाता है ।

उस शाम कक्षाओं से निवृत्त हो, मैं हाॅस्टल न जा कर सीधा IMS Library चला गया व आयुर्वेद के संहिता ग्रन्थों में हृदय व रस-रक्त-संवहन सम्बंधी उपलब्ध जानकारी एक स्थान पर संकलित करता रहा।

जो तथ्य मेरे समक्ष उजागर हुए वे कुछ इस प्रकार से थे –

1. व्यान-वायु रस धातु का, एक साथ, समस्त शरीर में निरन्तर विक्षेपण करता है;

2. रस सर्व शरीर में परिभ्रमण करते हुए, देह-धातुओं का तर्पण, प्रीणन, पोषण, संवर्धन इत्यादि करता है;

3. देह में विद्यमान अनेकों धमनियाँ होती हैं, जिनमें रस-रक्त-संवहन होने से ‘ध्मान’ (pulsation) होता है;

4. देह में विद्यमान अनेकों प्रकार की सिराएँ होती हैं जिनके माध्यम से अनेकों भावों का वहन होता है;

5. देह में कई प्रकार के स्रोतस् होते हैं, जिनके द्वारा देहगत रस-रक्तादि धातुओं सहित अनेकों अन्य भावों का वहन व स्रवण होता है; तथा

6. नाड़ी परीक्षा से रोगी-रोग परीक्षा की जाती है, दोषों की तारतम्यता ज्ञात होती है, रोगी -रोग बल का अनुमान लगाया जाता है ।

और, इस प्रकार की और भी ढेर सारी जानकारी मिली।
अगर, कुछ नहीँ मिला तो वह था रस-रक्त-संवहन (Blood Circulation) से हृदय का प्रत्यक्ष सम्बन्ध (direct relation)।

किञ्चित् हतोत्साहित, मैं पुस्तकालय से बाहर आ गया।
शाम ढल चुकी थी। स्ट्रीट लाईट के समीप पहुँच कर मैंने कलाई घड़ी पर नज़र डाली।
‘9.30’, घड़ी की सुईयों ने कहा।

‘काश! आयुर्वेद के किसी एक भी आचार्य ने हृदय का रस-रक्त-संवहन के साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध वर्णित किया होता’, हाॅस्टल के मार्ग में स्थित मालवीय भवन के सामने से गुजरते हुए मैंने अपने आप से कहा।
फिर भीतर से एक आवाज़ ने दिलासा देने के उद्देश्य से कहा, ‘तो भी, ‘हृदिस्थः व्यानः’ के आधार पर व्यान-वायु का हृदय से, व हृदय का रस-रक्त-संवहन से अप्रत्यक्ष सम्बन्ध (indirect relation) तो स्थापित किया ही जा सकता है!’

मुझे आयुर्वेद के मनीषियों पर गर्व हुआ जिन्होंने श्री हार्वे व श्री गैलन से कहीं पूर्व, सुदूर अतीत में, जबकि संसार का अधिकांश भूभाग अज्ञान के अन्धकार में डूबा हुआ था, रस-रक्त-संवहन पर इतनी विस्तृत व वैज्ञानिक जानकारी विश्व को दे दी थी।

मैं मानता हूँ कि भविष्य कभी न कभी न्याय अवश्य करेगा तथा आचार्य चरक को न केवल Medicine अपितु Cardiology का भी पिता स्वीकार करेगा…


डाॅ.वसिष्ठ
Dr. Sunil Vasishth
M. + 91-9419205439
Email : drvasishthsunil@gmail.com
Website : www.drvasishths.com

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