आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 29 ‘विकृतियाँ उत्पन्न होने की प्रक्रिया’

  आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 29

‘विकृतियाँ उत्पन्न होने की प्रक्रिया’

मेरा यह सुदृढ़ मत है कि – जगत् में ज्ञात वस्तुओं / भावों में यदि कुछ सर्वश्रेष्ठ है, तो वह है – मानव मन (मैं यहाँ बुद्धि, अहंकार, चित्त आदि का भी समावेश मन में ही कर रहा हूँ)।

मुझे मानव मन के अनेकों गुण अत्यधिक भाते हैं, यथा – सचेत रहना (Awareness), जानना (To know), विश्लेषण करना (Analysis), उहापोह करना (Discussion), विवेचना करना (Interpretation), कल्पना करना (Imagination), स्वीकार करना, (Acceptance), निश्चय करना (Resolution), सम्पादित करना (Implementation), इत्यादि ।

परन्तु, मानव मन का जो गुण मुझे सर्वाधिक भाता है, वह है – कुछ बेहतर करने व पाने के लिए, इसका आमतौर पर असन्तुष्ट (Dissatisfied) ही रहना, तथा ‘और-अधिक, और-अधिक’ की चाह रखना।
मेरी दृष्टि में ‘और-अधिक’ की चाह जीवन की निशानी है। ‘और-अधिक’ न चाहने वाला व्यक्ति, मेरी दृष्टि में अप्रगतिशील होता है, जिसका होना या न होना कोई विशेष अर्थ नहीँ रखता।


मेरा मन भी ‘और-अधिक, और-अधिक’ की माँग करने लगा था।
देह में विकृतियाँ उत्पन्न करने वाले हेतुओं (Etiological factors) के बारे में जान लेने के पश्चात्, अब मेरे अन्तर्मन में ‘और-अधिक’ जानकारी प्राप्त करने की उत्कट अभिलाषा तेज़ी से ज़ोर पकड़ती जा रही थी।

मैं जानना चाहता था कि – आख़िर ये सभी हेतु, देह में ऐसा क्या करते हैं, जिनसे देह की प्राकृत अवस्था समाप्त हो कर, विकृति (ख़राबी, बिगाड़, Abnormality) की स्थिति उत्पन्न हो जाती है ।

आने वाले कई दिनों तक मैं न केवल इस प्रश्न पर गम्भीरता से विचार करता रहा, अपितु लम्बे-लम्बे घण्टों तक पुस्तकालय में मौज़ूद मोटी-मोटी पुस्तकों में दिए अनेकों वैज्ञानिकों, विचारकों, व आयुर्वेद के मनीषियों के ख़ुलासों का मन्थन भी करता रहा।

इस गहन मन्थन में से जो सार निकला, वह कुछ इस प्रकार से था –

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान देह को भौतिक स्तर (Physical Plane) पर अस्तित्व रखने वाला एक ऐसा जैविकीय तन्त्र (Biological System) स्वीकार करता है, जो ब्रह्मांड का अभिन्न अंश होने के बावजूद, एक सीमित सी घटना (Event) से अधिक कुछ नहीँ है। गर्भाधान (Conception) से आरम्भ हो कर मृत्यु (Death) तक की सत्ता वाले इस तन्त्र की बाह्य सीमा (External boundary) त्वचा तक ही समाप्त हो जाती है।

स्पष्टतया, आधुनिक चिकित्सा विज्ञान त्वचा से परे जीवित देह का अस्तित्व स्वीकारने के लिए तैयार नहीं है।
यही कारण है कि, आधुनिक चिकित्सा विज्ञान देह के भीतर उपस्थित, सम्पूर्ण धातुओं (Tissues) व संस्थानों (Systems) को मुख्यतः समान दृष्टि से देखते हुए, उन्हें धातु (Tissue) का दर्ज़ा देते है, व उन के प्रति लगभग समानता का व्यवहार प्रदर्शित करता जाता है।

हाँ, कुछेक धातुओं व संस्थानों को अन्य धातुओं व संस्थानों की अपेक्षा वरीयता (Preference) अवश्य दी जाती है, यथा – Neuro-endocrine system, Immune system इत्यादि, परन्तु यह वरीयता किसी भी मायने में उन्हें अतिविशिष्ट स्थान प्रदान नहीं करती।

दूसरी ओर, आयुर्वेद का जीवन (Life) के प्रति दृष्टिकोण (आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की अपेक्षा) कहीं अधिक विस्तृत (Widespread), सूक्ष्म (Subtle), व व्यापक (Holistic) है।

जहां एक ओर, आयुर्वेद जीवित देह को, आत्मा-मन-शरीर के संयोग से निर्मित एक तन्त्र (Spirituo-psycho-biological System) मानता चला आ रहा था, वहीं दूसरी ओर वह इसे अखिल ब्रह्मांड का अणु-रूप (Icon) होने के साथ-साथ इसके साथ परम-अन्तरंगता (Intimately) से जुड़ा हुआ भी स्वीकारता है।

स्पष्टतया, जगत में घटने वाली हर छोटी-बड़ी घटना, जीवित देह को गहराई तक प्रभावित करती है, ऐसी मान्यता आयुर्वेद को स्वीकार्य है।
एक रोचक तथ्य यह भी है कि आयुर्वेद जीवित देह के समस्त अंग-प्रत्यंगों को एक समान न मानते हुए, गुण-कर्मों की श्रेष्ठता के आधार पर, उन्हें अनेक वर्गों में विभाजित कर, उनके प्रति दृष्टिकोण तय करता है।

उदाहरणार्थ, जीवित देह के –

1. सर्वश्रेष्ठ कार्यकारी भावों (Functional elements) को सर्वोच्च श्रेणी में स्थान देते हुए उन्हें ‘दोष’ की संज्ञा प्रदान की गई है;

2. रचना-कारक भावों (Structural elements) को पृथक् श्रेणी में स्थान देते हुए उन्हें ‘धातु-उपधातु’ (Tissues) की संज्ञा प्रदान की गई है;

3. आवागमन (Trasportation) के लिए, धातु-उपधातुओं में मौज़ूद रिक्त-स्थानों को पृथक् श्रेणी में स्थान देते हुए उन्हें ‘स्रोतस्’ (Channels) की संज्ञा प्रदान की गई है; तथा

4. जीवित देह में विद्यमान निष्कासन-योग्य भावों (Waste elements) को पृथक् श्रेणी में स्थान देते हुए उन्हें ‘मल’ की संज्ञा प्रदान की गई है।

जीवित देह के प्रति दोनों चिकित्सा पद्धतियों (आधुनिक चिकित्सा विज्ञान व आयुर्वेद) के दृष्टिकोणों में इस मौलिक अन्तर का एक प्रभाव, इस तथ्य पर भी पड़ता दीखता है कि, हेतु किस रीति से देह में विकृतियाँ (रोग) उत्पन्न करते हैं।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का मानना है कि हेतु प्रत्यक्ष रूप रूप से देह (के किसी एक अथवा अनेक)-

1. धातुओं की (मात्रया, कर्मतः) वृद्धि करते हैं;

2. धातुओं का (मात्रया, कर्मतः) क्षय/नाश करते हैं; तथा


3. धातुओं में शोथ/अवरोध उत्पन्न करते हैं।



उदाहरणार्थ –

1. देह के किसी अंगावयव में नियन्त्रित (Hypertrophy) अथवा अनियन्त्रित (Tumor) धातु-वृद्धि (Growth) मात्रया वृद्धि है;

2. देह के किसी अंगावयव में धातु-क्षय (Cell injury / degeneration / death), मात्रया क्षय है;

3. देह के किसी धातु / अंगावयव का आवश्यकता से अधिक (Hyperactivity) / कम (Hypoactivity) कार्य करना, कर्मतः वृद्धि अथवा क्षय है;

4. देह के किसी अंगावयव में रस-रक्तादि धातुओं / पोषक द्रव्यों का आवश्यकता से कम (Less) संवहन अवरोध का द्योतक है; तथा


5. देह के किसी अंगावयव में पाक होना शोथ (Inflammation) का द्योतक है…

डाॅ.वसिष्ठ
Dr. Sunil Vasishth
M. + 91-9419205439
Email : drvasishthsunil@gmail.com
Website : www.drvasishths.com

Comments are closed.

There are no products