आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 30 ‘विकृति उत्पत्ति प्रक्रिया (सम्प्राप्ति) – आयुर्वेद का दृष्टिकोण’

  आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 30

‘विकृति उत्पत्ति प्रक्रिया (सम्प्राप्ति) – आयुर्वेद का दृष्टिकोण’

सत्र तेज़ गति से आगे बढ़ चला था; और, इसी के साथ-साथ कक्षाओं में पढ़ाई का दबाव भी।

शीघ्र ही मुझे एहसास हो गया कि, कक्षाओं की नियमित पढ़ाई के साथ-साथ, कतिपय विषयों की गहराई तक डूब जाने का मेरा यह शौक पूरा करना कठिन था, तथा इसके लिए तो मुझे एक साथ ढेर सारे समय की आवश्यकता थी, जब मैं चित्त की वृत्तियों का यथा सम्भव निरोध करके, निर्बाध गति से अध्ययन कर सकूँ।

मैं मन ही मन इस प्रकार के समय के आने की तीव्रता से कामना कर ही रहा था, कि एक दिन हमें पता चला कि आगामी सप्ताह में तीन छुट्टियाँ एक साथ आ रही थीं।

एक साथ आने वाली तीन छुट्टियों के समाचार से मैं प्रसन्न था। मुझे लगा कि इन तीन दिनों के समय में, मैं पुस्तकालय में प्रातः से देर सायंकाल तक बैठ कर, विकृति उत्पत्ति (सम्प्राप्ति) से सम्बंधित, आयुर्वेद के दृष्टिकोण को, कम-से-कम कुछ सीमा तक तो अवश्य ही आत्मसात् कर लूँगा।

सच तो यह था कि एक साथ तीन छुट्टियाँ मेरे लिए बहुत अधिक महत्व रखती थीं।
कहाँ तो मैं चौबीस घण्टों में से एकाध घण्टा चुरा कर, अपने गहन अध्ययन (Deep sudy) का शौक़ पूरा करने की फ़िराक़ में रहता था, और कहाँ मुझ पर एक साथ कई घण्टों की बौछार होने जा रही थी।

मैंने गणित लगाया –

– निद्रा: 6 घण्टे
– स्नान व तैयार होना: 1 घण्टा
– खाना-पीना: 2 घण्टे
– आना-जाना: 1 घण्टा
– पढ़ाई: 14 घण्टे


कुल योगः 24 घण्टे

‘पढ़ाई के लिए 14 घण्टे काफ़ी हैं’, मैंने अपने आप से कहा । ‘तीन दिन में 42 घण्टे! मज़ा आएगा’ ।
मैं गदगद था। अचानक बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने वाला था।


तय दिन पर, मैंने अपने ‘मिशन-सम्प्राप्ति’ का बिगुल बजा दिया।
प्रातः 8 बजे पुस्तकालय खुलने पर भीतर प्रवेश करने वाला मैं प्रथम व्यक्ति था।

रात भर की ऊमस से भरे पुस्तकालय के मुख्य कक्ष में प्रवेश करने के बाद मैं दाहिनी ओर मुड़ा व आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की अनगिनत पुस्तकों से खचाखच भरी अलमारियों के समीप से गुजरता हुआ, द्रुत गति से लम्बे-लम्बे डग भरता, जर्नल सैक्शन से गुज़रा। फिर मैं अन्धियारे व ऊमस से सराबोर आयुर्वेद सैक्शन में पहुँचा, बत्तियाँ जलाईं, व अपने नियत स्थान पर कुर्सी-मेज़ पर बैठ गया।

अगले कुछ क्षण मैं यह सोचता रहा कि विकृति उत्पत्ति (सम्प्राप्ति) पर आयुर्वेद की मान्यता जानने के लिए कहां से आरम्भ करुँ।
मन में आने वाले अनेकों विचारों का जमावड़ा देख, मैंने मन को शान्त व एकाग्र करने हेतु, गहरे श्वास लेना व छोड़ना शुरू किया ।

फिर मैंने अपनी देह को किञ्चित् शिथिल किया व शनैः-शनैः अपना ध्यान बाहरी वातावरण से खींच कर, पहले अपनी देह पर, व फिर आते-जाते अपने श्वास पर केन्द्रित करना आरम्भ किया।
इसके बाद सहसा मुझे एक विचित्र सी अनुभूति होने लगी।

मुझे ऐसा प्रतीत होने लगा मानो मेरी देह का आकार असीम गति से बढ़ता चला जा रहा था, तथा जगत की हर वस्तु इसमें समाए जा रही थी।
अचानक मुझे लगा कि मेरा अस्तित्व, काल व दिशाओं का अतिक्रमण कर, एक ऐसी अवस्था में प्रवेश कर गया था, जिसे अनुभव तो किया जा सकता था, परंतु जिसका वर्णन सर्वथा असम्भव था।

मुझे ख़बर नहीँ कि मैं अपनी उस ‘असीम आकार वाली अवस्था’ में कितनी देर तक रहा।
फिर धीरे-धीरे मैं पुनः अपनी देह की सीमित अनुभूति वाली अवस्था में वापस लौट आया।
इस विचित्र अनुभूति ने मुझे अति-विस्मित कर दिया था। मुझे पता ही नहीँ चल पा रहा था कि आख़िर मुझे हुआ क्या था ।

यह सच है कि इस प्रकार की अनुभूतियाँ मुझे मेरे शैशवकाल से ही होती चली आ रही थीं, किन्तु वे अनुभूतियाँ इतनी प्रबल व गम्भीर कभी नहीें रहती थीं, व उनके दौरान चेतना की इस पराकाष्ठा पर मैं कभी न पहुँच पाया था।
फिर, सहसा एक विचार विद्युत गति से मेरे मन-मस्तिष्क में से हो कर गुज़रा व मैं खाली पड़े उस कक्ष में तेज़ गति से इधर-उधर चहल कदमी करने लगा।

‘कहीं ऐसा तो नहीँ कि मेरा अस्तित्व मेरी इस अनुभव-गम्य (Perceptible) देह से कहीं अधिक विशाल व कहीं अधिक सूक्ष्म है?’ मैं तीव्रता से सोचे जा रहा था।
‘तो क्या आयुर्वेद में वर्णित जीवित देह में सचमुच देह के अतिरिक्त मन व आत्मा का अस्तित्व है, जो भौतिक स्तर से परे व इन्द्रियातीत हैं?’ मैं सोचने लगा।

इस अनुभूति के पश्चात् मुझे आयुर्वेद के जीवन (Life) के प्रति दृष्टिकोण पर विश्वास, पूर्व की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ गया था।
इस विचार ने मेरे भीतर अपरिमित आत्मविश्वास जगा दिया था कि मेरा अस्तित्व मेरे भौतिक शरीर तक सीमित न रह कर, अखिल ब्रह्माण्ड तक व शाश्वत है।

ऐसा तभी सम्भव था जब मेरे अस्तित्व के लिए, शरीर से इतर भी कुछ कारक भाव उत्तरदायी हों, जो मेरी पांच इंद्रियों के कार्य-क्षेत्र से परे थे।

स्पष्ट है, आयुर्वेद ने इन इंद्रियातीत (Beyond the limit of five senses) भावों की पहचान मन व आत्मा के रूप में करते हुए, जीवित देह को देह+मन+आत्मा के संयोग से निर्मित एक अद्भुत तन्त्र (Unique Spirituo-psycho-biological System) स्वीकार करते हुए, इसके प्रति अपना दृष्टिकोण निर्धारित किया था।

ऐसा मान लेने मात्र से ही, जीवित देह की अखिल ब्रह्मांड के साथ परम-अन्तरंगता (Intimate bondage) स्वतः सिद्ध हुए जा रही थी।
इस अन्तर के स्पष्ट होते ही, मुझे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का जीवित देह के प्रति दृष्टिकोण एकदम भौतिक, संकुचित, छिछला, नकारात्मक, निराशावादी, व सीमित प्रतीत होने लगा।

वास्तविक विडम्बना तो यह थी कि ऐसे निराशावादी आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की नींव, भौतिक शास्त्र (Physics) के उस परम-आशावादी सिद्धांत – Law of Conservation of Energy – पर रखी गई थी, जो कहता है कि ‘शक्ति कभी नष्ट नहीँ की जा सकती, इसका तो रूपान्तरण मात्र होता है’।

दूसरी ओर, आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की अपेक्षा आयुर्वेद का दृष्टिकोण मुझे शाश्वत (Eternal), सार्वभौमिक (Universal), गहन (Profound), सकारात्मक (Positive), आशावादी (Optimistic), व असीम (Infinite) लगा।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के सर्वथा भौतिक दृष्टिकोण से मुझे गहरा दुःख होने लगा।

‘निराशावादी शास्त्र से, जगत् की सर्वश्रेष्ठ रचना – जीवित व्यक्ति – के कल्याण की आशा नहीें की जा सकती’, मैंने मन ही मन सोचा ।
इस विचार के मन में उभरते ही मेरे चलते क़दम सहसा रुक गए और मैं वापस अपने नियत स्थान पर कुर्सी-मेज़ पर बैठ गया ।

फिर अनायास मेरे दोनों हाथ उठे व मैंने सामने पड़ी चरक संहिता की तीन बार वन्दना की।
इसके पश्चात्, मैं मानव कल्याण के लिए सहस्रों वर्ष पूर्व रचित उस महान ग्रन्थ का अध्ययन करने में जुट गया।

उस दिन मैंने अपने भीतर आयुर्वेद के प्रति अभूतपूर्व श्रद्धा का संचार होते हुआ अनुभव किया…



डाॅ.वसिष्ठ
Dr. Sunil Vasishth
M. + 91-9419205439
Email : drvasishthsunil@gmail.com
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