आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 31 ‘विकृति उत्पत्ति में आयुर्वेद की विचारधारा’

  आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 31

‘विकृति उत्पत्ति में आयुर्वेद की विचारधारा’

उस दिन, सायंकाल 8 बजे पुस्तकालय के बन्द होने तक, मैं रोगोत्पत्ति सम्बंधित आयुर्वेद के दृष्टिकोण को गहराई से समझने का प्रयास करता रहा।

मुझे यह तथ्य काफ़ी हद तक स्पष्ट हो चला था कि आयुर्वेद के मनीषियों द्वारा सहस्रों वर्ष पूर्व, रोग की उत्पत्ति के बारे में स्थापित सिद्धांत, आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की अपेक्षा कहीं अधिक व्यापक, सूक्ष्म, व गहन थे।
इसका मूलभूत कारण था – जीवितदेह के प्रति दोनों विचारधाराओं में रहने वाला मौलिक अन्तर।

सत्य तो यह है कि भौतिकवाद (Physicality) की नींव पर टिके आधुनिक चिकित्सा विज्ञान को, भौतिक शरीर व उसे विकृत करने वाले मुट्ठी भर भौतिक हेतुओं से परे कुछ नज़र ही नहीँ आ रहा था।
विडम्बना तो यह थी, कि यह वही विज्ञान है, जिसका आधारभूत भौतिक शास्त्र (Physics) यह कहते न थकता है कि – ‘बिना ब्रह्माण्ड के सभी सितारों को हिलाए, हम अपनी अंगुली तक नहीँ हिला सकते।’

दूसरे शब्दों में – हम अंगुली भी हिलाते हैं तो ब्रह्माण्ड में मौज़ूद सम्पूर्ण तारामण्डल हिलता है।
सम्भवतः, आधुनिक चिकित्सा विज्ञान, यह स्वीकारना भूल गया था कि उपरोक्त सिद्धांत का उल्टा (Vice versa) भी सम्भव है।

अर्थात्, समस्त ब्रह्माण्ड में चल रहे क्रिया-कलापों का प्रभाव जीवित देह पर भी उसी अनुपात से पड़ता है।
सौभाग्यवश, आयुर्वेद के मनीषियों ने सुदूर अतीत में ही इस सत्य का न केवल प्रत्यक्षीकरण (Realization), अपितु संप्रयोग (Application) करते हुए ‘यथा लोके तथा पिण्डे’ व ‘परिणाम’ सरीखे सिद्धांत स्थापित करने का दुरूह कार्य कर दिखाया था।

संदेश स्पष्ट था – अखिल ब्रह्माण्ड में सतत घट रही घटनाओं का प्रभाव अखिल ब्रह्माण्ड में मौज़ूद प्रत्येक कण पर पड़े जा रहा है, तथा जीवित देह भी इस सब से अछूता न है।

ऐसे में, आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का असीम (Infinite) ब्रह्माण्ड को नज़रअंदाज कर, पृथ्वी के आसपास के कुछ मीलों तक फैले वातावरण (Environment) पर ही दृष्टि केन्द्रित करना अवैज्ञानिक नहीँ तो और क्या है?
सायं 8 बजे मैं पुस्तकालय से नागार्जुन छात्रावास जाने के लिए निकला। दिन भर के सतत अध्ययन से प्राप्त विचारों में मग्न, मैं कब अपने छात्रावास पहुँच गया, मुझे पता ही न चला।

छात्रावास सदा की भाँति शोरगुल में डूबा था। उस दिन अवकाश के कारण आम दिनों की अपेक्षा हलचल कुछ अधिक ही थी। कई छात्र इधर-उधर घूम रहे थे । कुछेक छात्र छोटे-छोटे समूहों में छात्रावास के मुहाने व दालान में आराम से बतिया रहे थे।

दोपहर का भोजन न करने के कारण, मुझे ज़ोरों की भूख लगी थी, अतः मैं सबसे नज़रें बचाते हुए सीधा अपने कमरे में पहुंचा, कपड़े बदले, ज़ल्दी से फ्रैश हुआ, व कमरा लाॅक करके सीधा मैस में जा घुसा ।
पकवान की भीनी-भीनी सुगन्ध ने मेरा स्वागत किया । मुझे याद आया, उस दिन शुक्रवार की संध्या थी – अर्थात् दावत के भोजन की शाम।

सदा की भाँति, मैस का हाॅल छात्रों से खचाखच भरा था, व एक अकेला भूलन इतने सारे भोजनेच्छुओं की क्षुधा-तृप्ति करने में अक्षम साबित हो रहा था।
एक बैंच के अन्तिम छोर पर रिक्त स्थान पा कर, मेरी बुझती आँखों में चमक आ गई ।

मैं लपक कर रिक्त स्थान में फिट हो गया व प्रिय भूलन की एक नज़र को तरसने लगा।
तभी एक साथ कई लोग भोजन पूरा कर उठ खड़े हुए, व अगले कुछ ही मिनटों में भूलन मेरी प्लेट में भोजन परोस रहा था।


बिना समय गंवाए मैं किसी भूखे शेर की माफ़िक भोजन पर टूट पड़ा व आकण्ठ भोजन करने के बाद ही चम्मच उल्टा रखा।

डाॅ.वसिष्ठ
Dr. Sunil Vasishth
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