आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 32 ‘सम्प्राप्ति के ज्ञान में आयुर्वेद की गहनता’

  आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धांत व प्रयोग: 32

‘सम्प्राप्ति के ज्ञान में आयुर्वेद की गहनता’

अगले दो दिनों में सम्प्राप्ति का मेरा अध्ययन और गहन होता गया।
मुझे इस तथ्य का गहरा एहसास हो चला था कि – आयुर्वेद में वर्णित विभिन्न हेतुओं का प्रभाव जीवित देह के दोनों घटकों – शरीर एवं मन पर होता है।

परन्तु, रोचक तथ्य तो यह था कि -हेतुओं का प्रभाव देह के विभिन्न घटकों पर भिन्न-भिन्न होता लग रहा था।
आयुर्वेद के जिस सबसे महत्वपूर्ण, विशिष्ट, व रोचक दृष्टिकोण ने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया वह था – ‘हेतु कोई भी हो (आगन्तुक को छोड़), वह वात-पित्त-कफ पर अपना प्रभाव डालता ही है’।

यह प्रभाव दो प्रकार का हो सकता है – वृद्धि अथवा क्षय ।

मैंने इसे इस प्रकार से समझने का प्रयास किया –
निज रोग उत्पन्न करने वाले सभी हेतु, जीवित देह के भीतर चलने वाली निम्न तीन प्रकार की क्रियाओं (Activities) को या तो बढ़ाते (Increase) हैं अथवा कम (Decrease) करते हैं –

1. नियंत्रक-क्रियाओं की वृद्धि / क्षय – Hyperactivity / hypoactivity of the neuro-endocrine activities;

2. पक्त्यात्मक क्रियाओं की वृद्धि / क्षय – Hyperactivity / hypoactivity of the metabolic activities; तथा

3. रक्षात्मक-क्रियाओं की वृद्धि / क्षय – Hyperactivity / hypoactivity of the defence mechanisms.

दूसरे शब्दों में आयुर्वेद इस विचारधारा को मानता प्रतीत हो रहा था कि, समस्त ब्रह्माण्ड में चल रहे क्रिया-कलाप हों अथवा आहार-विहार, सभी से जीवित देह में चल रही उपरोक्त तीन प्रक्रियाओं में या तो बढ़ोतरी अथवा कमी आती ही है, जो आगे चलकर विकृति का आधार बन सकती हैं।

जीवित देह में चल रही इन तीन मौलिक प्रक्रियाओं के प्रभावित होने के बारे में इतनी स्पष्टता मुझे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में दिखाई नहीं दे रही थी।
इस दृष्टि में मैं आयुर्वेद की विचारधारा को श्रेष्ठतर मान रहा था।

यही नहीँ, एक क़दम और आगे बढ़ाते हुए, आयुर्वेद इस तथ्य को भी स्वीकारता लग रहा था कि, रोग उत्पन्न करने वाले हेतु, जीवित-देह के धातुओं/उपधातुओं को (दोषों के समान) बढ़ाते व कम तो करते ही हैं, बल्कि एक नितांत नवीन स्थिति – ‘दुष्टि’ भी पैदा करते हैं।

दूसरे शब्दों में, जहाँ दोषों पर हेतुओं का प्रभाव मुख्य रूप से प्रकृति-सम-समवेतात्मक (Quantitative) ही था, वहीं धातुओं / उपधातुओं पर यह प्रभाव प्रकृति-सम-समवेतात्मक (Quantitative) के साथ-साथ, विकृति-विषम-समवेतात्मक (Qualitative) भी था।

इस का अभिप्राय यह है कि, हेतुओं से जहाँ दोष-द्रव्यों (neuro-transmitters, hormones, enzymes, antibodies etc.) की केवल मात्रया / कर्मणा वृद्धि अथवा क्षय होता है, वहीं धातु-द्रव्यों / उपधातु-द्रव्यों (Cells / substances that constitute body tissues) की मात्रया / कर्मणा वृद्धि अथवा क्षय के साथ-साथ इनमें सर्वथा नवीन द्रव्यों का निर्माण (दुष्टि) भी होता है। यूँ तो यह दुष्टि मुख्यतः दोषों के द्वारा ही सम्भव है, किन्तु हेतुओं द्वारा प्रत्यक्ष धातु-दुष्टि की सम्भावना से भी इन्कार नहीँ किया जा सकता।

इसका एक प्रमाण यह है कि हेतु जहाँ एक ओर दोष-वृद्धि/क्षय व धातु-वृद्धि/क्षय कर रहे होते हैं, वहीं दूसरी ओर, स्रोतसों में दुष्टि (ख-वैगुण्य) भी करते जाते हैं, ताकि बढ़े हुए दोष उस स्थान में एकत्रित (संश्रित) हो सकें, व उसके परिणाम-स्वरूप रोग की सम्प्राप्ति की आधारशिला रखी जा सके।

अब, क्योंकि जीवित-देह में स्रोतसों (रिक्त-स्थानों) का निर्माण तो धातु-उपधातुओं से ही होता है, अतः इस तथ्य को स्वीकारा जा सकता है कि हेतु प्रत्यक्ष रूप से भी धातुओं की वृद्धि/क्षय/दुष्टि कर सकते हैं।

एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य जो मेरे समक्ष उपस्थित हुआ वह यह था, कि पक्त्यात्मक क्रियाओं (Metabolic activities) को असाधारण महत्व देते हुए, आयुर्वेद ने यहाँ तक मान लिया था कि, सभी रोगों में बनने वाली सम्प्राप्ति और कुछ नहीं बल्कि पक्त्यात्मक क्रियाओं की विकृति-मात्र है (रोगाः सर्वेऽपि मन्देऽग्नौ)।

हाँलाकि, मुझे यह अतिशयोक्ति ही लगी, क्योंकि मेरी दृष्टि में सभी रोगों को पक्त्यात्मक रोग (Metabolic diseases) कहना अनुचित है, तो भी इससे रोगों की सम्प्राप्ति में अग्नि की विकृति तो इंगित होती ही है।

पराकाष्ठा तो यह थी कि, आयुर्वेद हेतुओं का प्रभाव निष्कासन-योग्य द्रव्यों (Waste products) तक स्वीकारे जा रहा था, जो आयुर्वेद के मनीषियों की रोग की उत्पत्ति सम्बंधी गहन अध्ययन व ज्ञान का द्योतक थी।

दूसरी ओर, आयुर्वेद इस गहन तथ्य को भी प्रतिपादित किए जा रहा था कि हेतुओं का प्रभाव मन पर भी पड़ता है, जिससे से रजस् व तमस् की वृद्धि/क्षय होते हुए रोग की उत्पत्ति होती है।

सच तो यह है कि आयुर्वेद प्रत्येक रोग की सम्प्राप्ति में देह व मन, दोनों की सहभागिता स्वीकारते हुए रोगों को दो प्रधान वर्गों में विभाजित करता लगा रहा था –

1. मनो-दैहिक (Psycho-somatic); व

2. देह-मानस (Somato-psychic) ।

जीवित देह में रोगोत्पत्ति करने वाले हेतुओं व उन हेतुओं से उत्पन्न होने वाली विकृतियों की प्रक्रियाओं का इस प्रकार का अध्ययन, विश्लेषण, व सत्याबुद्धि की प्राप्ति का जो प्रदर्शन आयुर्वेद के मनीषियों ने किया था, वह मुझे सदा वन्दनीय लगा रहा था।

मैंने मन ही मन सुदूर अतीत के उन महान पुरुषों को प्रणाम किया व हार्दिक धन्यवाद दिया ।
अवकाश का तीसरा दिन समाप्त होने पर मेरे कई सहपाठियों ने शिकायत की – ‘इन तीन दिनों में तो समय गुजारना भी मुश्किल हो गया था’।

मैं भीतर ही भीतर मुस्कुरा रहा था – ‘काश! कुछ और समय मिल जाता तो कुछ और अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर पा लेता’।
मैं प्रसन्न था । अति प्रसन्न ।

ज्ञान से मिलने वाली प्रसन्नता सचमुच बेजोड़ होती है…

डाॅ.वसिष्ठ
Dr. Sunil Vasishth
M. + 91-9419205439
Email : drvasishthsunil@gmail.com
Website : www.drvasishths.com

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